अध्याय 6 : हैलोऐल्केन तथा हैलोऐरीन ( Haloalkanes and Haloarenes )
Class 12 Chemistry Chapter 6 Haloalkanes and Haloarenes 2027 की तैयारी के लिए यहाँ Notes, Important Questions, PYQ Questions और Online Quiz उपलब्ध हैं।
★ महत्वपूर्ण परिभाषाएँ
1. हैलोऐल्केन (Haloalkane)
वे कार्बनिक यौगिक जिनमें किसी ऐल्केन के एक या अधिक हाइड्रोजन परमाणुओं के स्थान पर हैलोजन परमाणु F, Cl, Br या I जुड़ा होता है, हैलोऐल्केन कहलाते हैं।
2. हैलोऐरीन (Haloarene)
वे एरोमैटिक यौगिक जिनमें हैलोजन परमाणु सीधे एरोमैटिक वलय के कार्बन से जुड़ा होता है, हैलोऐरीन कहलाते हैं।
3. हैलोजन (Halogen)
फ्लोरीन, क्लोरीन, ब्रोमीन और आयोडीन को हैलोजन कहा जाता है। इन्हें सामान्यतः X से दर्शाते हैं।
4. ऐल्किल हैलाइड (Alkyl Halide)
ऐसे हैलोऐल्केन जिनमें हैलोजन ऐल्किल समूह से जुड़ा हो, ऐल्किल हैलाइड कहलाते हैं।
5. न्यूक्लियोफाइल (Nucleophile)
वह कण जो इलेक्ट्रॉन-समृद्ध होता है और इलेक्ट्रॉन की जोड़ी देकर इलेक्ट्रॉन की कमी वाले परमाणु पर आक्रमण करता है, न्यूक्लियोफाइल कहलाता है।
6. इलेक्ट्रोफाइल (Electrophile)
वह कण जो इलेक्ट्रॉन की कमी वाला होता है और इलेक्ट्रॉन की जोड़ी को स्वीकार करता है, इलेक्ट्रोफाइल कहलाता है।
7. न्यूक्लियोफिलिक प्रतिस्थापन (Nucleophilic Substitution)
वह अभिक्रिया जिसमें हैलाइड यौगिक में उपस्थित हैलोजन परमाणु को कोई न्यूक्लियोफाइल प्रतिस्थापित कर देता है, न्यूक्लियोफिलिक प्रतिस्थापन कहलाता है।
8. उन्मूलन अभिक्रिया (Elimination Reaction)
वह अभिक्रिया जिसमें एक ही अणु से छोटे अणु या समूह के निकलने के कारण द्विबंध बनता है, उन्मूलन अभिक्रिया कहलाती है।
9. SN1 अभिक्रिया
वह न्यूक्लियोफिलिक प्रतिस्थापन अभिक्रिया जिसकी दर केवल एक अभिकारक की सांद्रता पर निर्भर करती है और जो सामान्यतः दो चरणों में होती है, SN1 अभिक्रिया कहलाती है।
10. SN2 अभिक्रिया
वह न्यूक्लियोफिलिक प्रतिस्थापन अभिक्रिया जिसमें न्यूक्लियोफाइल का आक्रमण और प्रतिस्थापन एक ही चरण में होता है तथा अभिक्रिया की दर दोनों अभिकारकों पर निर्भर करती है, SN2 अभिक्रिया कहलाती है।
11. ग्रिग्नार्ड अभिकर्मक (Grignard Reagent)
ऐसे कार्बनिक-मैग्नीशियम यौगिक जिनका सामान्य रूप R–Mg–X होता है, ग्रिग्नार्ड अभिकर्मक कहलाते हैं।
12. चिरलता (Chirality)
जब किसी अणु की दर्पण प्रतिबिंबित संरचना उससे पूर्णतः अध्यारोपित न हो सके, तो ऐसी संरचना चिरल कहलाती है।
13. प्रकाशीय समावयवता (Optical Isomerism)
ऐसी समावयवता जिसमें यौगिक के दो रूप समतल ध्रुवित प्रकाश को अलग-अलग दिशाओं में घुमा सकते हैं, प्रकाशीय समावयवता कहलाती है।
14. रेसिमिक मिश्रण (Racemic Mixture)
दो प्रकाशीय समावयवियों का बराबर मात्रा में मिश्रण, जो समतल ध्रुवित प्रकाश के घुमाव को परस्पर समाप्त कर देता है, रेसिमिक मिश्रण कहलाता है।
15. एलीलिक हैलाइड (Allylic Halide)
जिसमें हैलोजन उस sp³ कार्बन से जुड़ा हो जो C=C द्विबंध वाले कार्बन के ठीक पास हो, उसे एलीलिक हैलाइड कहते हैं।
16. बेंज़िलिक हैलाइड (Benzylic Halide)
जिसमें हैलोजन उस sp³ कार्बन से जुड़ा हो जो सीधे बेंजीन वलय से जुड़ा है, उसे बेंज़िलिक हैलाइड कहते हैं।
17. विनाइल हैलाइड (Vinylic Halide)
जिसमें हैलोजन सीधे C=C द्विबंध वाले sp² कार्बन से जुड़ा हो, उसे विनाइल हैलाइड कहते हैं।
18. एरिल हैलाइड (Aryl Halide)
जिसमें हैलोजन सीधे एरोमैटिक वलय के sp² कार्बन से जुड़ा हो, उसे एरिल हैलाइड कहते हैं।
1. हैलोऐल्केन तथा हैलोऐरीन का वर्गीकरण (Classification of Haloalkanes and Haloarenes)
परिभाषा
हैलोऐल्केन तथा हैलोऐरीन को हैलोजन परमाणुओं की संख्या, हैलोजन से जुड़े कार्बन की प्रकृति तथा संरचना के आधार पर अलग-अलग वर्गों में बाँटा जाता है।
(A) हैलोजन परमाणुओं की संख्या के आधार पर
एकहैलोजनी यौगिक (Monohalo) — एक हैलोजन परमाणु।
उदाहरण: CH₃Cl
द्विहैलोजनी यौगिक (Dihalo) — दो हैलोजन परमाणु।
उदाहरण: CH₂Cl₂
बहुहैलोजनी यौगिक (Polyhalo) — दो से अधिक हैलोजन परमाणु।
उदाहरण: CCl₄
(B) ऐल्किल हैलाइड में कार्बन के आधार पर
प्राथमिक (1°):
R–CH₂–X
द्वितीयक (2°):
R₂CH–X
तृतीयक (3°):
R₃C–X
(C) विशेष प्रकार
i. एलीलिक हैलाइड
ii. बेंज़िलिक हैलाइड
iii. विनाइल हैलाइड
iv. एरिल हैलाइड
मुख्य बिंदु
i. प्राथमिक, द्वितीयक और तृतीयक वर्गीकरण उस कार्बन की प्रकृति पर आधारित है जिससे X जुड़ा है।
ii. एलीलिक और बेंज़िलिक हैलाइड की अभिक्रियाशीलता सामान्य ऐल्किल हैलाइड से अलग हो सकती है।
iii. विनाइल और एरिल हैलाइड में हैलोजन sp² कार्बन से जुड़ा होता है।
उदाहरण
i. CH₃CH₂Cl → प्राथमिक हैलाइड
ii. CH₃CHClCH₃ → द्वितीयक हैलाइड
iii. (CH₃)₃CCl → तृतीयक हैलाइड
2. C–X बंध की प्रकृति (Nature of C–X Bond)
परिभाषा
हैलोऐल्केन में कार्बन और हैलोजन के बीच बना बंध ध्रुवीय सहसंयोजक बंध होता है, क्योंकि हैलोजन की विद्युतऋणात्मकता कार्बन से अधिक होती है।
Cδ+ — Xδ−
इस कारण कार्बन पर आंशिक धनावेश और हैलोजन पर आंशिक ऋणावेश आता है।
बंध की मजबूती
सामान्यतः:
C–F > C–Cl > C–Br > C–I
अर्थात् C–I बंध अपेक्षाकृत कमजोर होता है।
इसका महत्व
C–X बंध टूटने की सुगमता न्यूक्लियोफिलिक प्रतिस्थापन में बहुत महत्वपूर्ण है।
मुख्य बिंदु
i. C–X बंध ध्रुवीय होता है।
ii. कार्बन न्यूक्लियोफाइल के आक्रमण के लिए अपेक्षाकृत इलेक्ट्रॉन-कमी वाला बनता है।
iii. आयोडाइड सामान्यतः अच्छा leaving group है।
उदाहरण
i. CH₃Cl में Cδ+ और Clδ−
ii. CH₃Br में Cδ+ और Brδ−
iii. CH₃I में C–I बंध अपेक्षाकृत आसानी से टूटता है।
3. हैलोऐल्केन के भौतिक गुण (Physical Properties)
परिभाषा
हैलोऐल्केन के भौतिक गुण उनके आणविक द्रव्यमान, संरचना, हैलोजन तथा अणुओं के बीच आकर्षण बलों पर निर्भर करते हैं।
मुख्य बिंदु
i. सामान्यतः इनका क्वथनांक संबंधित हाइड्रोकार्बन से अधिक होता है।
ii. अधिकांश हैलोऐल्केन जल में कम घुलते हैं।
iii. ये सामान्यतः कार्बनिक विलायकों में अच्छी तरह घुलते हैं।
विशेषताएँ
i. आणविक द्रव्यमान बढ़ने पर सामान्यतः क्वथनांक बढ़ता है।
ii. समावयवियों में शाखित संरचना से क्वथनांक बदल सकता है।
iii. भारी हैलोजन वाले यौगिकों का द्रव्यमान अधिक होता है।
उदाहरण
i. CH₃Cl
ii. CH₃Br
iii. CH₃I
4. हैलोऐल्केन की तैयारी (Preparation of Haloalkanes)
हैलोऐल्केन कई विधियों से बनाए जा सकते हैं।
(A) ऐल्कोहॉल से
ऐल्कोहॉल को उपयुक्त हैलोजन-अभिकर्मक से अभिक्रिया कराने पर हैलोऐल्केन बनता है।
R–OH + HX → R–X + H₂O
उदाहरण:
C₂H₅OH + HCl → C₂H₅Cl + H₂O
क्लोरीन यौगिक बनाने में PCl₅, PCl₃ या SOCl₂ का भी उपयोग किया जाता है।
मुख्य बिंदु
i. यह हैलोऐल्केन की सामान्य तैयारी विधि है।
ii. अलग-अलग हैलोजन के लिए अलग अभिकर्मक उपयोग किए जा सकते हैं।
iii. SOCl₂ से बने उत्पाद को अलग करना अपेक्षाकृत सुविधाजनक होता है क्योंकि उप-उत्पाद गैसीय होते हैं।
—
(B) ऐल्केन से
ऐल्केन की मुक्त-मूलक हैलोजनीकरण अभिक्रिया से हैलोऐल्केन बनाए जा सकते हैं।
RH + Cl₂ → RCl + HCl
यह अभिक्रिया प्रकाश की उपस्थिति में होती है।
ध्यान दें
इस विधि में कई समावयवी उत्पाद बन सकते हैं, इसलिए यह हमेशा चयनात्मक नहीं होती।
—
(C) हैलोजन विनिमय
क्लोराइड या ब्रोमाइड को आयोडाइड में बदलने के लिए NaI का प्रयोग किया जा सकता है।
R–Cl + NaI → R–I + NaCl
इसे सामान्यतः फिंकेलस्टीन अभिक्रिया (Finkelstein Reaction) कहते हैं।
5. हैलोऐरीन की तैयारी (Preparation of Haloarenes)
(A) एरोमैटिक यौगिकों का हैलोजनीकरण
बेंजीन की क्लोरीन या ब्रोमीन के साथ उपयुक्त लुईस अम्ल की उपस्थिति में अभिक्रिया कराने पर हैलोऐरीन बनता है।
C₆H₆ + Cl₂ → C₆H₅Cl + HCl
उपयुक्त उत्प्रेरक के रूप में FeCl₃/Fe का प्रयोग किया जाता है।
(B) डायज़ोनियम लवण से
एरिल डायज़ोनियम लवण से विभिन्न हैलोऐरीन बनाए जा सकते हैं। इस वर्ग में सैंडमेयर तथा गैटरमैन जैसी अभिक्रियाएँ महत्वपूर्ण हैं।
मुख्य बिंदु
i. हैलोऐरीन बनाने की विधि हैलोजन और प्रारंभिक यौगिक पर निर्भर करती है।
ii. डायज़ोनियम लवणों की सहायता से विशिष्ट एरिल हैलाइड बनाए जा सकते हैं।
iii. एरिल हैलाइड और ऐल्किल हैलाइड की अभिक्रियाशीलता समान नहीं होती।
6. न्यूक्लियोफिलिक प्रतिस्थापन अभिक्रिया (Nucleophilic Substitution Reaction)
परिभाषा
जब हैलोऐल्केन में उपस्थित हैलोजन परमाणु को कोई न्यूक्लियोफाइल प्रतिस्थापित कर देता है, तो इस अभिक्रिया को न्यूक्लियोफिलिक प्रतिस्थापन कहते हैं।
सामान्य रूप:
R–X + Nu⁻ → R–Nu + X⁻
यहाँ X leaving group और Nu⁻ न्यूक्लियोफाइल है।
उदाहरण
CH₃Br + OH⁻ → CH₃OH + Br⁻
सामान्य न्यूक्लियोफाइल
OH⁻, CN⁻, NH₃, I⁻ आदि।
मुख्य बिंदु
i. न्यूक्लियोफाइल इलेक्ट्रॉन की जोड़ी देता है।
ii. हैलोजन leaving group के रूप में निकल सकता है।
iii. C–X बंध की प्रकृति अभिक्रिया की गति को प्रभावित करती है।
तीन उदाहरण
i. R–Br + OH⁻ → R–OH
ii. R–Cl + CN⁻ → R–CN
iii. R–I + NH₃ → R–NH₂
7. SN2 अभिक्रिया (SN2 Reaction)
परिभाषा
SN2 अभिक्रिया एक द्विअणुक न्यूक्लियोफिलिक प्रतिस्थापन अभिक्रिया है जिसमें न्यूक्लियोफाइल का आक्रमण और leaving group का निकलना लगभग एक ही चरण में होता है।
दर नियम
Rate = k[R–X][Nu⁻]
इसलिए यह दोनों अभिकारकों की सांद्रता पर निर्भर करती है।
विशेषता
SN2 अभिक्रिया में न्यूक्लियोफाइल सामान्यतः पीछे की ओर से आक्रमण करता है। चिरल केंद्र होने पर विन्यास का उलटाव हो सकता है।
इसे Walden inversion कहा जाता है।
SN2 के लिए अनुकूलता
सामान्य क्रम:
CH₃X > 1° > 2° >> 3°
क्योंकि अधिक शाखित संरचना न्यूक्लियोफाइल के पीछे से आक्रमण में बाधा डालती है।
मुख्य बिंदु
i. एक ही चरण में होती है।
ii. द्विअणुक होती है।
iii. विन्यास का inversion हो सकता है।
उदाहरण
CH₃Br + OH⁻ → CH₃OH + Br⁻
8. SN1 अभिक्रिया (SN1 Reaction)
परिभाषा
SN1 एक एक-अणुक न्यूक्लियोफिलिक प्रतिस्थापन अभिक्रिया है जिसमें पहले कार्बोकैटायन बनता है और बाद में न्यूक्लियोफाइल उससे जुड़ता है।
दर नियम
Rate = k[R–X]
अर्थात् दर केवल हैलोऐल्केन की सांद्रता पर निर्भर करती है।
चरण
पहला चरण:
R–X → R⁺ + X⁻
दूसरा चरण:
R⁺ + Nu⁻ → R–Nu
अभिक्रियाशीलता
सामान्यतः:
3° > 2° > 1°
क्योंकि अधिक स्थायी कार्बोकैटायन बनने से SN1 आसान होती है।
मुख्य बिंदु
i. दो मुख्य चरण होते हैं।
ii. मध्यवर्ती कार्बोकैटायन बनता है।
iii. चिरल यौगिकों में रेसिमीकरण हो सकता है।
उदाहरण
तृतीयक ब्यूटाइल ब्रोमाइड जैसे यौगिक SN1 के लिए अनुकूल होते हैं।
9. SN1 और SN2 में अंतर (Difference between SN1 and SN2)
आधार| SN1| SN2
चरण| दो मुख्य चरण| एक चरण
दर| k[R–X]| k[R–X][Nu⁻]
मध्यवर्ती| कार्बोकैटायन| कोई स्वतंत्र कार्बोकैटायन नहीं
अनुकूल हैलाइड| 3°| CH₃/1°
न्यूक्लियोफाइल| अपेक्षाकृत कमजोर भी चल सकता है| अच्छा न्यूक्लियोफाइल उपयोगी
स्टीरियोरसायन| रेसिमीकरण संभव| inversion
विलायक| ध्रुवीय प्रोटिक उपयोगी| ध्रुवीय एप्रोटिक उपयोगी
परीक्षा में याद रखें
SN1 → 1 molecule → Carbocation
SN2 → 2 species → One step
10. न्यूक्लियोफाइल और उसके प्रकार (Nucleophile and its Types)
परिभाषा
इलेक्ट्रॉन की जोड़ी देने वाले कण को न्यूक्लियोफाइल कहते हैं।
प्रकार
ऋणावेशित न्यूक्लियोफाइल:
OH⁻, CN⁻, I⁻
उदासीन न्यूक्लियोफाइल:
NH₃, H₂O
द्विदंती न्यूक्लियोफाइल
कुछ न्यूक्लियोफाइल दो अलग-अलग परमाणुओं के माध्यम से अभिक्रिया कर सकते हैं।
उदाहरण: CN⁻ और NO₂⁻
ऐसे न्यूक्लियोफाइल को ambident nucleophile कहा जाता है।
मुख्य बिंदु
i. न्यूक्लियोफाइल इलेक्ट्रॉन-समृद्ध होता है।
ii. यह इलेक्ट्रॉन की जोड़ी प्रदान करता है।
iii. उसकी शक्ति विलायक और संरचना पर निर्भर कर सकती है।
11. हैलोऐल्केन की कुछ महत्वपूर्ण अभिक्रियाएँ (Important Reactions of Haloalkanes)
(A) जलीय KOH से
R–X + KOH(aq) → R–OH + KX
उत्पाद — ऐल्कोहॉल
—
(B) अल्कोहॉलिक KOH से
R–X + KOH(alc.) → Alkene + KX + H₂O
यह उन्मूलन अभिक्रिया है।
महत्वपूर्ण अंतर
जलीय KOH → प्रतिस्थापन
अल्कोहॉलिक KOH + गर्मी → उन्मूलन
—
(C) KCN से
R–X + KCN → R–CN + KX
उत्पाद — नाइट्राइल।
—
(D) AgCN से
R–X + AgCN → R–NC + AgX
यहाँ मुख्य उत्पाद आइसोसाइनाइड बन सकता है।
कारण
CN⁻ एक ambident nucleophile है और KCN में कार्बन से, जबकि AgCN में नाइट्रोजन से जुड़ने की प्रवृत्ति अलग होती है।
—
(E) NH₃ से
R–X + NH₃ → R–NH₂
अर्थात् प्राथमिक अमीन बनाया जा सकता है।
12. वुर्ट्ज अभिक्रिया (Wurtz Reaction)
परिभाषा
ऐल्किल हैलाइड को सोडियम धातु के साथ शुष्क ईथर में अभिक्रिया कराने पर उच्च ऐल्केन प्राप्त होता है। इसे वुर्ट्ज अभिक्रिया कहते हैं।
2R–X + 2Na → R–R + 2NaX
उदाहरण
2CH₃Cl + 2Na → C₂H₆ + 2NaCl
मुख्य बिंदु
i. इसमें सोडियम धातु का उपयोग होता है।
ii. शुष्क ईथर माध्यम उपयोग किया जाता है।
iii. सामान्यतः समान ऐल्किल समूह वाले यौगिकों से सममित ऐल्केन प्राप्त करना आसान होता है।
सीमा
दो अलग-अलग ऐल्किल हैलाइड लेने पर कई उत्पादों का मिश्रण बन सकता है।
13. ग्रिग्नार्ड अभिकर्मक (Grignard Reagent)
परिभाषा
ऐसे कार्बनिक-मैग्नीशियम यौगिक जिनका सामान्य सूत्र R–Mg–X होता है, ग्रिग्नार्ड अभिकर्मक कहलाते हैं।
निर्माण
R–X + Mg → R–Mg–X
माध्यम — शुष्क ईथर
उदाहरण
CH₃Br + Mg → CH₃MgBr
सबसे जरूरी सावधानी
ग्रिग्नार्ड अभिकर्मक नमी के प्रति अत्यंत संवेदनशील होते हैं। इसलिए अभिक्रिया में पूर्णतः शुष्क माध्यम आवश्यक होता है।
जल से अभिक्रिया
R–MgX + H₂O → R–H + Mg(OH)X
मुख्य बिंदु
i. R–MgX कार्बनिक संश्लेषण में अत्यंत उपयोगी है।
ii. जल इसकी अभिक्रिया को रोक देता है।
iii. कार्बन-कार्बन बंध बनाने में इसका विशेष महत्व है।
उदाहरण
i. CH₃MgBr
ii. C₂H₅MgBr
iii. C₆H₅MgBr
14. एरिल हैलाइड की न्यूक्लियोफिलिक प्रतिस्थापन अभिक्रिया (Nucleophilic Substitution in Aryl Halides)
मुख्य विचार
एरिल हैलाइड सामान्यतः ऐल्किल हैलाइड की तुलना में न्यूक्लियोफिलिक प्रतिस्थापन के प्रति कम अभिक्रियाशील होते हैं।
कारण
(1) अनुनाद (Resonance):
C–X बंध में आंशिक द्विबंध का गुण आ जाता है।
(2) sp² कार्बन:
हैलोजन से जुड़ा कार्बन sp² संकरण वाला होता है।
(3) बंध की मजबूती:
C–X बंध अपेक्षाकृत मजबूत हो जाता है।
उदाहरण
क्लोरोबेंजीन सामान्य परिस्थितियों में OH⁻ के साथ आसानी से प्रतिस्थापन नहीं करता।
मुख्य बिंदु
i. क्लोरोबेंजीन में C–Cl बंध में आंशिक द्विबंध गुण होता है।
ii. इसलिए बंध तोड़ना कठिन होता है।
iii. कठोर परिस्थितियों में कुछ एरिल हैलाइड प्रतिस्थापन दे सकते हैं।
15. उन्मूलन अभिक्रिया (Elimination Reaction)
परिभाषा
जब हैलोऐल्केन से HX जैसे छोटे अणु के घटक निकलते हैं और कार्बन-कार्बन द्विबंध बनता है, तो इसे उन्मूलन अभिक्रिया कहते हैं।
उदाहरण:
CH₃CH₂Br + KOH(alc.) → CH₂=CH₂ + KBr + H₂O
जैत्सेव नियम
Saytzeff Rule
असमान अल्कीनों के बनने की स्थिति में सामान्यतः अधिक स्थायी और अधिक प्रतिस्थापित अल्कीन मुख्य उत्पाद के रूप में प्राप्त होता है।
मुख्य बिंदु
i. सामान्यतः अल्कीन बनता है।
ii. अल्कोहॉलिक KOH उन्मूलन को बढ़ावा देता है।
iii. ताप बढ़ाने पर उन्मूलन की प्रवृत्ति बढ़ सकती है।
उदाहरण
i. ब्रोमोऐल्केन + alcoholic KOH
ii. क्लोरोऐल्केन + alcoholic KOH
iii. उपयुक्त परिस्थितियों में आयोडोऐल्केन का elimination
16. एरोमैटिक हैलो यौगिकों की विशेषता (Special Nature of Haloarenes)
परिभाषा
एरिल हैलाइड में हैलोजन सीधे एरोमैटिक वलय से जुड़ा रहता है। इसकी अभिक्रियाशीलता ऐल्किल हैलाइड से अलग होती है।
विशेषताएँ
i. C–X बंध में अनुनाद का प्रभाव होता है।
ii. हैलोजन के lone pair इलेक्ट्रॉन वलय के साथ अनुनाद में भाग ले सकते हैं।
iii. इसलिए C–X बंध अपेक्षाकृत मजबूत होता है।
महत्वपूर्ण तथ्य
हैलोजन एरोमैटिक वलय को deactivate करता है, लेकिन फिर भी वह ortho और para directing होता है।
यह बिंदु परीक्षा में अक्सर भ्रम पैदा करता है।
17. हैलोऐल्केन की अभिक्रियाशीलता पर प्रभाव डालने वाले कारक (Factors Affecting Reactivity)
प्रमुख कारक
i. C–X बंध की मजबूती
ii. कार्बन की संरचना
iii. न्यूक्लियोफाइल की प्रकृति
iv. विलायक
v. steric hindrance
vi. बनने वाले मध्यवर्ती की स्थिरता
महत्वपूर्ण क्रम
SN1 के लिए:
3° > 2° > 1°
SN2 के लिए:
CH₃ > 1° > 2° >> 3°
याद रखने की ट्रिक
SN1 को carbocation की stability चाहिए।
SN2 को खाली जगह चाहिए।
18. चिरलता और SN1/SN2 (Chirality and SN1/SN2)
चिरल कार्बन
यदि किसी कार्बन परमाणु से चार अलग-अलग समूह जुड़े हों, तो वह सामान्यतः चिरल केंद्र हो सकता है।
SN2
SN2 में पीछे से आक्रमण के कारण:
Configuration inversion
होता है।
SN1
SN1 में समतलीय कार्बोकैटायन बनने के कारण न्यूक्लियोफाइल दोनों ओर से आक्रमण कर सकता है। इसलिए:
Racemisation
हो सकती है।
मुख्य बिंदु
i. SN2 → inversion
ii. SN1 → racemisation की प्रवृत्ति
iii. चिरलता का संबंध उत्पाद की त्रिविमीय संरचना से है।
19. पॉलीहैलोजनी यौगिक (Polyhalogen Compounds)
परिभाषा
जिन कार्बनिक यौगिकों में दो या दो से अधिक हैलोजन परमाणु उपस्थित हों, उन्हें पॉलीहैलोजनी यौगिक कहा जाता है।
उदाहरण
i. CH₂Cl₂ — डाइक्लोरोमीथेन
ii. CHCl₃ — क्लोरोफॉर्म
iii. CCl₄ — कार्बन टेट्राक्लोराइड
कुछ पॉलीहैलोजनी यौगिकों के औद्योगिक उपयोग रहे हैं, लेकिन कई यौगिक पर्यावरणीय दृष्टि से हानिकारक पाए गए हैं। NCERT भी कुछ ऐसे यौगिकों के पर्यावरणीय प्रभाव, विशेषकर ओजोन परत से संबंधित समस्या, पर चर्चा करता है।
20. महत्वपूर्ण पर्यावरणीय तथ्य (Environmental Effects)
मुख्य बातें
i. कुछ हैलोजनी यौगिक लंबे समय तक पर्यावरण में बने रह सकते हैं।
ii. कुछ पुराने औद्योगिक यौगिक ओजोन परत के क्षरण से जुड़े पाए गए हैं।
iii. इसलिए इनके उपयोग और निपटान में पर्यावरणीय सावधानी आवश्यक है।
महत्वपूर्ण उदाहरण
CFCs — क्लोरोफ्लोरोकार्बन
इनका उपयोग पहले रेफ्रिजरेशन आदि में किया जाता था, लेकिन इनके पर्यावरणीय प्रभाव के कारण इनके उपयोग पर कई स्थानों पर नियंत्रण लगाया गया।
DDT भी एक महत्वपूर्ण पॉलीहैलोजनी यौगिक है, जिसका ऐतिहासिक रूप से कीटनाशक के रूप में उपयोग हुआ।
★ महत्वपूर्ण अभिक्रियाएँ — एक साथ
1. ऐल्कोहॉल से हैलोऐल्केन
R–OH + HX → R–X + H₂O
2. जलीय KOH
R–X + KOH(aq) → R–OH + KX
3. अल्कोहॉलिक KOH
R–X + KOH(alc.) → Alkene + KX + H₂O
4. KCN
R–X + KCN → R–CN + KX
5. AgCN
R–X + AgCN → R–NC + AgX
6. अमोनिया
R–X + NH₃ → R–NH₂
7. वुर्ट्ज अभिक्रिया
2R–X + 2Na → R–R + 2NaX
8. ग्रिग्नार्ड अभिकर्मक
R–X + Mg → R–MgX
9. ग्रिग्नार्ड + जल
R–MgX + H₂O → R–H + Mg(OH)X
10. हैलोजन विनिमय
R–Cl + NaI → R–I + NaCl
★ Quick Revision
याद रखने योग्य क्रम
C–F > C–Cl > C–Br > C–I
बंधन मजबूती का सामान्य क्रम।
SN1:
3° > 2° > 1°
SN2:
CH₃ > 1° > 2° >> 3°
मुख्य बातें
– हैलोऐल्केन में C–X बंध ध्रुवीय होता है।
– न्यूक्लियोफाइल इलेक्ट्रॉन की जोड़ी देता है।
– leaving group इलेक्ट्रॉन की जोड़ी लेकर निकलता है।
– SN1 में कार्बोकैटायन बनता है।
– SN2 में एक ही चरण होता है।
– SN2 में inversion होता है।
– SN1 में racemisation हो सकती है।
– aqueous KOH सामान्यतः substitution कराता है।
– alcoholic KOH elimination को बढ़ावा देता है।
– R–MgX को शुष्क माध्यम में रखना आवश्यक है।
– वुर्ट्ज अभिक्रिया से उच्च ऐल्केन बनते हैं।
– एरिल हैलाइड सामान्यतः ऐल्किल हैलाइड से कम reactive होते हैं।
– हैलोजन deactivating होते हुए भी ortho/para directing होता है।
★ पूरे अध्याय के जरूरी सूत्र / सामान्य रूप
1. ऐल्किल हैलाइड का सामान्य सूत्र
CₙH₂ₙ₊₁X
2. न्यूक्लियोफिलिक प्रतिस्थापन
R–X + Nu⁻ → R–Nu + X⁻
3. SN1 की दर
Rate = k[R–X]
4. SN2 की दर
Rate = k[R–X][Nu⁻]
5. ग्रिग्नार्ड अभिकर्मक
R–Mg–X
6. वुर्ट्ज अभिक्रिया
2R–X + 2Na → R–R + 2NaX
7. जलीय KOH
R–X + KOH(aq) → R–OH + KX
8. अल्कोहॉलिक KOH
R–X + KOH(alc.) → Alkene + KX + H₂O
★ परीक्षा के लिए सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न
बहुत छोटे उत्तर वाले प्रश्न
1. हैलोऐल्केन क्या हैं?
2. हैलोऐरीन क्या हैं?
3. न्यूक्लियोफाइल क्या है?
4. इलेक्ट्रोफाइल क्या है?
5. leaving group क्या होता है?
6. SN1 का पूरा नाम लिखिए।
7. SN2 का पूरा नाम लिखिए।
8. ग्रिग्नार्ड अभिकर्मक का सामान्य सूत्र लिखिए।
9. वुर्ट्ज अभिक्रिया क्या है?
10. एलीलिक हैलाइड क्या है?
11. बेंज़िलिक हैलाइड क्या है?
12. विनाइल हैलाइड क्या है?
13. एरिल हैलाइड क्या है?
14. C–X बंध ध्रुवीय क्यों होता है?
15. ग्रिग्नार्ड अभिकर्मक को नमी से क्यों बचाया जाता है?
★ बोर्ड परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण दीर्घ प्रश्न
प्रश्न 1.
SN1 तथा SN2 अभिक्रियाओं में अंतर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर का मुख्य ढाँचा
SN1 एक एक-अणुक तथा दो-चरणीय अभिक्रिया है जिसमें कार्बोकैटायन बनता है। इसकी दर केवल हैलोऐल्केन की सांद्रता पर निर्भर करती है।
SN2 एक द्विअणुक तथा एक-चरणीय अभिक्रिया है जिसमें न्यूक्लियोफाइल का आक्रमण और leaving group का निकलना साथ-साथ होता है। इसकी दर दोनों अभिकारकों की सांद्रता पर निर्भर करती है।
—
प्रश्न 2.
ग्रिग्नार्ड अभिकर्मक क्या है? इसकी तैयारी लिखिए।
उत्तर:
R–Mg–X प्रकार के कार्बनिक-मैग्नीशियम यौगिक ग्रिग्नार्ड अभिकर्मक कहलाते हैं।
R–X + Mg → R–MgX
यह अभिक्रिया शुष्क ईथर में की जाती है क्योंकि ग्रिग्नार्ड अभिकर्मक जल से अभिक्रिया करके नष्ट हो जाता है।
—
प्रश्न 3.
वुर्ट्ज अभिक्रिया समझाइए।
उत्तर:
ऐल्किल हैलाइड को सोडियम धातु के साथ शुष्क ईथर में गर्म करने पर उच्च ऐल्केन बनता है।
2R–X + 2Na → R–R + 2NaX
—
प्रश्न 4.
हैलोऐल्केन में C–X बंध की प्रकृति समझाइए।
उत्तर:
हैलोजन की विद्युतऋणात्मकता कार्बन से अधिक होने के कारण C–X बंध ध्रुवीय होता है। कार्बन पर आंशिक धनावेश तथा हैलोजन पर आंशिक ऋणावेश आता है। यही ध्रुवीयता न्यूक्लियोफिलिक प्रतिस्थापन जैसी अभिक्रियाओं में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
★ स्वयं जाँचें — Chapter Test
प्रश्न 1.
SN2 अभिक्रिया में कितने मुख्य चरण होते हैं?
उत्तर: एक।
प्रश्न 2.
SN1 में कौन-सा मध्यवर्ती बनता है?
उत्तर: कार्बोकैटायन।
प्रश्न 3.
SN2 में configuration पर क्या प्रभाव पड़ता है?
उत्तर: Inversion होता है।
प्रश्न 4.
SN1 में optical activity का क्या हो सकता है?
उत्तर: Racemisation की संभावना होती है।
प्रश्न 5.
R–MgX को किससे बचाना चाहिए?
उत्तर: नमी/जल से।
प्रश्न 6.
वुर्ट्ज अभिक्रिया में कौन-सी धातु प्रयोग होती है?
उत्तर: सोडियम।
प्रश्न 7.
जलीय KOH सामान्यतः कौन-सी अभिक्रिया कराता है?
उत्तर: न्यूक्लियोफिलिक प्रतिस्थापन।
प्रश्न 8.
अल्कोहॉलिक KOH सामान्यतः किसे बढ़ावा देता है?
उत्तर: उन्मूलन अभिक्रिया।
प्रश्न 9.
ग्रिग्नार्ड अभिकर्मक का सामान्य सूत्र क्या है?
उत्तर: R–MgX
प्रश्न 10.
एरिल हैलाइड में हैलोजन किस प्रकार के कार्बन से जुड़ा होता है?
उत्तर: sp² संकरित एरोमैटिक कार्बन से।
★ अभ्यास के लिए 10 महत्वपूर्ण अभिक्रियाएँ
1. C₂H₅Br + KOH(aq) → ?
2. C₂H₅Br + KOH(alc.) → ?
3. CH₃Br + KCN → ?
4. CH₃Br + AgCN → ?
5. CH₃Br + Mg → ?
6. CH₃MgBr + H₂O → ?
7. 2CH₃Br + 2Na → ?
8. C₂H₅OH + HBr → ?
9. C₆H₆ + Cl₂ → ?
10. R–X + NH₃ → ?
उत्तर
1. C₂H₅OH
2. CH₂=CH₂
3. CH₃CN
4. CH₃NC
5. CH₃MgBr
6. CH₄
7. C₂H₆
8. C₂H₅Br
9. C₆H₅Cl
10. R–NH₂
★ सामान्य गलतियाँ — इन्हें जरूर याद रखें
गलती 1: SN1 को एक-चरणीय समझना।
→ सही: SN1 में कार्बोकैटायन वाला दो-चरणीय mechanism होता है।
गलती 2: SN2 में कार्बोकैटायन बनाना।
→ सही: SN2 में स्वतंत्र कार्बोकैटायन नहीं बनता।
गलती 3: aqueous KOH और alcoholic KOH को समान समझना।
→ aqueous KOH → substitution की प्रवृत्ति
→ alcoholic KOH → elimination की प्रवृत्ति
गलती 4: KCN और AgCN से हमेशा एक ही उत्पाद मान लेना।
→ दोनों की प्रकृति अलग होने के कारण उत्पाद में अंतर हो सकता है।
गलती 5: ग्रिग्नार्ड अभिकर्मक को नमी में रखना।
→ यह जल से तुरंत अभिक्रिया करता है।
गलती 6: यह मान लेना कि हैलोजन हमेशा meta-directing होता है।
→ हैलोजन deactivating लेकिन ortho/para directing होता है।
★ अंतिम सार
इस अध्याय का मूल विचार कार्बन–हैलोजन बंध और उसकी अभिक्रियाशीलता को समझना है। पहले हैलोऐल्केन और हैलोऐरीन का वर्गीकरण समझें, फिर C–X बंध की प्रकृति देखें। इसके बाद न्यूक्लियोफिलिक प्रतिस्थापन में SN1 और SN2, उन्मूलन अभिक्रिया, वुर्ट्ज अभिक्रिया और ग्रिग्नार्ड अभिकर्मक को समझना सबसे जरूरी है।
एक लाइन में पूरा अध्याय:
C–X बंध की प्रकृति → न्यूक्लियोफाइल का आक्रमण → Substitution या Elimination → SN1/SN2 → Grignard → Haloarenes की विशेषता → पर्यावरणीय प्रभाव
★ परीक्षा से पहले अंतिम 8 बातें
1. SN1 = दो चरण + carbocation
2. SN2 = एक चरण + inversion
3. 3° halide → SN1 के लिए अधिक अनुकूल
4. 1° halide → SN2 के लिए अधिक अनुकूल
5. aqueous KOH → alcohol
6. alcoholic KOH → alkene
7. R–MgX → dry ether
8. Haloarenes → alkyl halides की तुलना में सामान्यतः कम reactive