अध्याय 4 : d और f-ब्लॉक के तत्व
UP Board Class 12 Chemistry Chapter 4 – The d- and f-Block Elements 2027 के Notes, Important Questions, PYQ और Online Quiz यहाँ उपलब्ध हैं।
(d और f-Block Elements)
यह अध्याय आवर्त सारणी के उन तत्वों से जुड़ा है जिनमें d या f-कक्षक धीरे-धीरे भरते हैं। संक्रमण तत्वों के रंग, अलग-अलग ऑक्सीकरण अवस्थाएँ, चुंबकीय व्यवहार और उत्प्रेरक गुण इसी अध्याय की खास बातें हैं। आगे लैन्थेनॉयड और एक्टिनॉयड के इलेक्ट्रॉनिक विन्यास, ऑक्सीकरण अवस्थाओं और लैन्थेनॉयड संकुचन को समझेंगे।
अध्याय की महत्वपूर्ण परिभाषाएँ
1. d-ब्लॉक तत्व (d-Block Elements)
वे तत्व जिनमें अंतिम इलेक्ट्रॉन सामान्यतः (n−1)d उपकोश में प्रवेश करता है, d-ब्लॉक तत्व कहलाते हैं।
2. संक्रमण तत्व (Transition Elements)
वे तत्व जिनके परमाणु या उनके किसी आयन में d-उपकोश पूर्णतः भरा हुआ न हो, संक्रमण तत्व कहलाते हैं।
3. आंतरिक संक्रमण तत्व (Inner Transition Elements)
वे तत्व जिनमें अंतिम इलेक्ट्रॉन f-उपकोश में प्रवेश करता है, आंतरिक संक्रमण तत्व कहलाते हैं।
4. लैन्थेनॉयड (Lanthanoids)
Ce से Lu तक के वे तत्व जिनमें 4f उपकोश क्रमशः भरता है, लैन्थेनॉयड कहलाते हैं।
5. एक्टिनॉयड (Actinoids)
Th से Lr तक के वे तत्व जिनमें 5f उपकोश क्रमशः भरता है, एक्टिनॉयड कहलाते हैं।
6. ऑक्सीकरण अवस्था (Oxidation State)
किसी यौगिक में किसी तत्व के परमाणु पर उपस्थित माने गए आवेश को उसकी ऑक्सीकरण अवस्था कहते हैं।
7. लैन्थेनॉयड संकुचन (Lanthanoid Contraction)
La से Lu की ओर जाने पर लैन्थेनॉयड परमाणुओं और आयनों की त्रिज्या में होने वाली क्रमिक कमी को लैन्थेनॉयड संकुचन कहते हैं।
8. अंतराकाशी यौगिक (Interstitial Compounds)
वे यौगिक जिनमें छोटे परमाणु जैसे H, C या N धातु के क्रिस्टल जालक के रिक्त स्थानों में प्रवेश कर जाते हैं, अंतराकाशी यौगिक कहलाते हैं।
9. मिश्रधातु (Alloy)
दो या अधिक धातुओं अथवा धातु और अन्य तत्व के ठोस मिश्रण को मिश्रधातु कहते हैं।
10. चुंबकीय आघूर्ण (Magnetic Moment)
किसी परमाणु या आयन के अयुग्मित इलेक्ट्रॉनों के कारण उत्पन्न चुंबकीय प्रभाव को चुंबकीय आघूर्ण द्वारा व्यक्त किया जाता है।
1. d-ब्लॉक का सामान्य परिचय (General Introduction)
परिभाषा
आवर्त सारणी में समूह 3 से समूह 12 तक के तत्वों को d-ब्लॉक तत्व कहा जाता है। इन तत्वों में अंतिम इलेक्ट्रॉन सामान्यतः (n−1)d उपकोश में प्रवेश करता है।
इलेक्ट्रॉनिक विन्यास (Electronic Configuration)
d-ब्लॉक तत्वों का सामान्य बाहरी इलेक्ट्रॉनिक विन्यास होता है—
(n−1)d¹–¹⁰ ns⁰–²
उदाहरण—
Sc : [Ar] 3d¹ 4s²
Ti : [Ar] 3d² 4s²
Fe : [Ar] 3d⁶ 4s²
Cu : [Ar] 3d¹⁰ 4s¹
Zn : [Ar] 3d¹⁰ 4s²
Cu और Cr जैसे कुछ तत्वों में अपेक्षित विन्यास से थोड़ा अंतर मिलता है क्योंकि आधा भरा या पूर्ण भरा d-उपकोश अधिक स्थिर होता है।
मुख्य बातें
– d-ब्लॉक आवर्त सारणी के बीच में स्थित है।
– इसमें समूह 3 से 12 तक के तत्व आते हैं।
– अधिकांश d-ब्लॉक तत्व धातु होते हैं।
– इनमें परिवर्ती ऑक्सीकरण अवस्थाएँ सामान्य हैं।
– इनके कई आयन रंगीन होते हैं।
– अनेक तत्व अच्छे उत्प्रेरक का काम करते हैं।
विशेष स्थिति
Zn, Cd और Hg में d-उपकोश पूर्णतः भरा होता है। इसलिए इन्हें सामान्यतः संक्रमण तत्वों की श्रेणी में नहीं रखा जाता।
छोटे उदाहरण
1. Sc में 3d उपकोश में 1 इलेक्ट्रॉन होता है।
2. Fe में 3d उपकोश आंशिक रूप से भरा है।
3. Zn में 3d¹⁰ विन्यास पूर्ण भरा हुआ है।
2. संक्रमण तत्वों के इलेक्ट्रॉनिक विन्यास (Electronic Configuration of Transition Elements)
परिभाषा
संक्रमण तत्वों में बाहरी ns उपकोश के साथ-साथ उससे ठीक अंदर का (n−1)d उपकोश भी रासायनिक व्यवहार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
सामान्य सूत्र
(n−1)d¹–¹⁰ ns⁰–²
यह सूत्र क्या बताता है?
यह बताता है कि संक्रमण तत्वों में d-उपकोश क्रमशः भरता है और ns उपकोश में सामान्यतः 0 से 2 इलेक्ट्रॉन हो सकते हैं।
मुख्य बिंदु
– d-इलेक्ट्रॉन रासायनिक गुणों को प्रभावित करते हैं।
– ns और (n−1)d दोनों इलेक्ट्रॉन बंध निर्माण में भाग ले सकते हैं।
– इसी कारण कई संक्रमण तत्व एक से अधिक ऑक्सीकरण अवस्थाएँ दिखाते हैं।
छोटे उदाहरण
1. Fe : [Ar] 3d⁶ 4s²
2. Co : [Ar] 3d⁷ 4s²
3. Ni : [Ar] 3d⁸ 4s²
3. संक्रमण तत्वों की प्रमुख विशेषताएँ (Characteristics of Transition Elements)
परिभाषा
वे गुण जो संक्रमण तत्वों को अन्य धातुओं से अलग पहचान देते हैं, जैसे परिवर्ती ऑक्सीकरण अवस्था, रंग, चुंबकीय गुण, उत्प्रेरक गुण और मिश्रधातु निर्माण, संक्रमण तत्वों की प्रमुख विशेषताएँ कहलाती हैं।
मुख्य बिंदु
धात्विक प्रकृति
संक्रमण तत्व सामान्यतः कठोर, चमकीले और अच्छे ऊष्मा तथा विद्युत चालक होते हैं।
उच्च गलनांक और क्वथनांक
अधिकांश संक्रमण तत्वों में धात्विक बंध मजबूत होते हैं, इसलिए उनके गलनांक और क्वथनांक अपेक्षाकृत अधिक होते हैं।
परिवर्ती ऑक्सीकरण अवस्था
d और s दोनों इलेक्ट्रॉन रासायनिक क्रिया में भाग ले सकते हैं। इसलिए एक ही तत्व कई ऑक्सीकरण अवस्थाएँ दिखा सकता है।
रंग
अधूरे d-उपकोश वाले आयन सामान्यतः रंगीन हो सकते हैं।
चुंबकीय गुण
अयुग्मित d-इलेक्ट्रॉनों की उपस्थिति के कारण कई संक्रमण आयन अनुचुंबकीय होते हैं।
उत्प्रेरक गुण
Fe, Ni, V₂O₅ आदि विभिन्न रासायनिक प्रक्रियाओं में उत्प्रेरक की तरह काम कर सकते हैं।
मिश्रधातु निर्माण
संक्रमण तत्व एक-दूसरे के साथ आसानी से मिश्रधातु बना सकते हैं।
4. प्रथम संक्रमण श्रेणी (First Transition Series)
परिभाषा
Sc से Zn तक के तत्वों की श्रेणी को प्रथम संक्रमण श्रेणी कहते हैं। इसमें 3d उपकोश क्रमशः भरता है।
श्रेणी
Sc → Ti → V → Cr → Mn → Fe → Co → Ni → Cu → Zn
मुख्य बिंदु
– Sc से Zn तक परमाणु क्रमांक बढ़ता है।
– d-इलेक्ट्रॉनों की संख्या सामान्यतः बढ़ती है।
– ऑक्सीकरण अवस्थाओं में विविधता दिखाई देती है।
– मध्य के तत्वों में कई ऑक्सीकरण अवस्थाएँ मिलती हैं।
– Mn अधिकतम ऑक्सीकरण अवस्थाओं में से कई प्रदर्शित करता है।
छोटे उदाहरण
1. Sc की प्रमुख अवस्था +3 है।
2. Fe +2 और +3 दोनों अवस्थाएँ दिखाता है।
3. Mn +2 से +7 तक कई अवस्थाएँ दिखा सकता है।
5. धात्विक प्रकृति (Metallic Character)
परिभाषा
इलेक्ट्रॉन त्यागकर धनायन बनाने और धातुओं के सामान्य गुण प्रदर्शित करने की प्रवृत्ति को धात्विक प्रकृति कहते हैं।
मुख्य बातें
संक्रमण तत्वों में—
– धात्विक चमक होती है।
– ये सामान्यतः अच्छे चालक होते हैं।
– इनके परमाणुओं के बीच मजबूत धात्विक बंध पाए जाते हैं।
– अधिकांश ठोस अवस्था में पाए जाते हैं।
विशेष स्थिति
पारे (Hg) को छोड़कर सामान्य ताप पर लगभग सभी प्रथम संक्रमण श्रेणी के तत्व ठोस होते हैं।
छोटे उदाहरण
1. Fe का उपयोग भवन और मशीनों में होता है।
2. Cu विद्युत तारों में उपयोगी है।
3. Cr का उपयोग धातु की सतह को चमकदार और टिकाऊ बनाने में किया जाता है।
6. आयनीकरण एन्थैल्पी (Ionisation Enthalpy)
परिभाषा
गैसीय अवस्था में किसी उदासीन परमाणु से सबसे कमजोर बंधे इलेक्ट्रॉन को हटाकर धनायन बनाने के लिए आवश्यक न्यूनतम ऊर्जा को आयनीकरण एन्थैल्पी कहते हैं।
मुख्य जानकारी
प्रथम संक्रमण श्रेणी में बाएँ से दाएँ जाने पर आयनीकरण एन्थैल्पी में सामान्यतः धीरे-धीरे वृद्धि होती है, लेकिन d और s इलेक्ट्रॉनों की स्थिरता के कारण पूर्ण नियमितता नहीं मिलती।
मुख्य बिंदु
– परमाणु क्रमांक बढ़ने पर नाभिकीय आवेश बढ़ता है।
– d-इलेक्ट्रॉन परिरक्षण में पूरी तरह प्रभावी नहीं होते।
– इसलिए इलेक्ट्रॉन हटाना धीरे-धीरे कठिन होता जाता है।
– कुछ स्थानों पर इलेक्ट्रॉनिक विन्यास के कारण अनियमितता मिलती है।
छोटे उदाहरण
1. Cr और Cu के विन्यास सामान्य अपेक्षा से अलग हैं।
2. Mn का अर्ध-भरा d⁵ विन्यास विशेष स्थिरता देता है।
3. Zn का d¹⁰ विन्यास पूर्ण भरा हुआ है।
7. ऑक्सीकरण अवस्थाएँ (Oxidation States)
परिभाषा
किसी यौगिक में किसी तत्व के परमाणु द्वारा प्रदर्शित विद्युत आवेश जैसी अवस्था को उसकी ऑक्सीकरण अवस्था कहते हैं।
मुख्य जानकारी
संक्रमण तत्वों में (n−1)d और ns इलेक्ट्रॉनों की ऊर्जा में बहुत अधिक अंतर नहीं होता। इसलिए दोनों प्रकार के इलेक्ट्रॉन बंध निर्माण में भाग ले सकते हैं और कई ऑक्सीकरण अवस्थाएँ प्राप्त होती हैं।
मुख्य बिंदु
– Sc की प्रमुख अवस्था +3 है।
– Ti +2, +3 और +4 दिखा सकता है।
– V +2 से +5 तक अवस्थाएँ दिखा सकता है।
– Cr की प्रमुख अवस्थाएँ +2, +3 और +6 हैं।
– Mn +2 से +7 तक अवस्थाएँ दिखाता है।
– Fe में +2 और +3 बहुत सामान्य हैं।
– Cu में +1 और +2 सामान्य हैं।
ऑक्सीकरण संख्या निकालने का सूत्र
तटस्थ यौगिक में—
सभी परमाणुओं की ऑक्सीकरण संख्याओं का योग = 0
आयन में—
सभी परमाणुओं की ऑक्सीकरण संख्याओं का योग = आयन का आवेश
चार संख्यात्मक उदाहरण
उदाहरण 1
KMnO₄ में Mn की ऑक्सीकरण अवस्था ज्ञात कीजिए।
K = +1
O = −2
+1 + Mn + 4(−2) = 0
Mn − 7 = 0
Mn = +7
उदाहरण 2
K₂Cr₂O₇ में Cr की ऑक्सीकरण अवस्था ज्ञात कीजिए।
2(+1) + 2Cr + 7(−2) = 0
2 + 2Cr − 14 = 0
2Cr = 12
Cr = +6
उदाहरण 3
Fe₂O₃ में Fe की ऑक्सीकरण अवस्था ज्ञात कीजिए।
2Fe + 3(−2) = 0
2Fe − 6 = 0
Fe = +3
उदाहरण 4
MnO₄⁻ में Mn की ऑक्सीकरण अवस्था ज्ञात कीजिए।
Mn + 4(−2) = −1
Mn − 8 = −1
Mn = +7
8. आयनिक त्रिज्या (Ionic Radius)
परिभाषा
किसी आयन के प्रभावी आकार को उसकी आयनिक त्रिज्या कहते हैं।
मुख्य बातें
संक्रमण श्रेणी में बाएँ से दाएँ जाने पर परमाणु क्रमांक बढ़ता है, जबकि d-इलेक्ट्रॉन नाभिकीय आवेश को पूरी तरह नहीं रोक पाते। इसलिए त्रिज्या में सामान्यतः धीरे-धीरे कमी आती है।
विशेष स्थिति
एक ही तत्व के धनायन में अधिक धनात्मक आवेश होने पर सामान्यतः आयनिक त्रिज्या कम हो जाती है।
छोटे उदाहरण
1. Fe²⁺ की त्रिज्या Fe³⁺ से अधिक होती है।
2. Ti²⁺ की त्रिज्या Ti³⁺ से अधिक होती है।
3. समान आवेश वाले कई संक्रमण आयनों में परमाणु क्रमांक बढ़ने पर त्रिज्या धीरे-धीरे घटती है।
9. रंगीन आयन (Coloured Ions)
परिभाषा
वे आयन जो दृश्य प्रकाश के किसी भाग को अवशोषित करके शेष प्रकाश को आँखों तक पहुँचाते हैं, रंगीन दिखाई देते हैं।
रंग क्यों दिखाई देता है?
अधूरे d-उपकोश में d-कक्षकों के बीच इलेक्ट्रॉन ऊर्जा ग्रहण करके एक स्तर से दूसरे स्तर पर जा सकता है। इस प्रक्रिया में दृश्य प्रकाश का कुछ भाग अवशोषित हो सकता है, जिससे आयन रंगीन दिखाई देता है।
मुख्य बिंदु
– अधूरा d-उपकोश रंग का प्रमुख कारण है।
– d⁰ और d¹⁰ विन्यास वाले आयन सामान्यतः रंगहीन होते हैं।
– यौगिक और माध्यम बदलने पर रंग भी बदल सकता है।
छोटे उदाहरण
1. Ti³⁺ रंगीन आयन है।
2. Cu²⁺ के अनेक यौगिक रंगीन होते हैं।
3. Zn²⁺ सामान्यतः रंगहीन होता है क्योंकि इसका d-उपकोश d¹⁰ है।
विशेष स्थिति
d⁰ या d¹⁰ आयन सामान्यतः रंगहीन होते हैं।
10. चुंबकीय गुण (Magnetic Properties)
परिभाषा
किसी परमाणु या आयन का चुंबकीय क्षेत्र के प्रति व्यवहार उसके चुंबकीय गुण कहलाता है।
अनुचुंबकीय पदार्थ (Paramagnetic)
जिन पदार्थों में एक या अधिक अयुग्मित इलेक्ट्रॉन होते हैं, वे सामान्यतः अनुचुंबकीय होते हैं।
प्रतिचुंबकीय पदार्थ (Diamagnetic)
जिन पदार्थों में सभी इलेक्ट्रॉन युग्मित होते हैं, वे प्रतिचुंबकीय होते हैं।
चुंबकीय आघूर्ण का सूत्र
μ = √n(n + 2) BM
जहाँ—
μ = चुंबकीय आघूर्ण
n = अयुग्मित इलेक्ट्रॉनों की संख्या
BM = बोहर मैग्नेटॉन
यह सूत्र क्या बताता है?
यह सूत्र किसी आयन के अयुग्मित इलेक्ट्रॉनों की संख्या से उसका अनुमानित चुंबकीय आघूर्ण बताता है।
मुख्य बातें
– अयुग्मित इलेक्ट्रॉन अधिक → अनुचुंबकीय प्रभाव अधिक।
– सभी इलेक्ट्रॉन युग्मित → प्रतिचुंबकीय।
– n = 0 होने पर μ = 0।
चार संख्यात्मक उदाहरण
उदाहरण 1
किसी आयन में 1 अयुग्मित इलेक्ट्रॉन है। उसका चुंबकीय आघूर्ण ज्ञात कीजिए।
μ = √1(1 + 2)
μ = √3
μ = 1.73 BM
उदाहरण 2
किसी आयन में 3 अयुग्मित इलेक्ट्रॉन हैं। चुंबकीय आघूर्ण ज्ञात कीजिए।
μ = √3(3 + 2)
μ = √15
μ ≈ 3.87 BM
उदाहरण 3
किसी आयन में 5 अयुग्मित इलेक्ट्रॉन हैं। चुंबकीय आघूर्ण ज्ञात कीजिए।
μ = √5(5 + 2)
μ = √35
μ ≈ 5.92 BM
उदाहरण 4
किसी आयन में सभी इलेक्ट्रॉन युग्मित हैं। उसका चुंबकीय आघूर्ण ज्ञात कीजिए।
n = 0
μ = √0(0 + 2)
μ = 0 BM
11. उत्प्रेरक गुण (Catalytic Properties)
परिभाषा
जो पदार्थ स्वयं स्थायी रूप से खर्च हुए बिना रासायनिक अभिक्रिया की गति को बदलता है, उसे उत्प्रेरक कहते हैं।
संक्रमण तत्व अच्छे उत्प्रेरक क्यों हैं?
संक्रमण तत्वों में परिवर्ती ऑक्सीकरण अवस्थाएँ होती हैं और वे अभिकारकों के साथ अस्थायी मध्यवर्ती बना सकते हैं। इससे अभिक्रिया के लिए वैकल्पिक मार्ग उपलब्ध हो जाता है।
मुख्य बिंदु
– परिवर्ती ऑक्सीकरण अवस्था महत्वपूर्ण है।
– सतह पर अभिकारकों का अवशोषण हो सकता है।
– कुछ संक्रमण धातुएँ नए बंध बनने और टूटने में सहायता करती हैं।
छोटे उदाहरण
1. Fe का उपयोग अमोनिया निर्माण में उत्प्रेरक के रूप में होता है।
2. Ni हाइड्रोजनीकरण अभिक्रियाओं में उपयोगी है।
3. V₂O₅ सल्फ्यूरिक अम्ल निर्माण की प्रक्रिया में उपयोगी उत्प्रेरक है।
12. अंतराकाशी यौगिक (Interstitial Compounds)
परिभाषा
जब छोटे आकार के परमाणु संक्रमण धातु के क्रिस्टल जालक के रिक्त स्थानों में प्रवेश कर जाते हैं, तो बने यौगिकों को अंतराकाशी यौगिक कहते हैं।
मुख्य बातें
– इनमें H, C और N जैसे छोटे परमाणु पाए जा सकते हैं।
– ये सामान्यतः कठोर होते हैं।
– इनके गलनांक बहुत अधिक हो सकते हैं।
– धातु की विद्युत चालकता पूरी तरह समाप्त नहीं होती।
– इनका एक उदाहरण टाइटेनियम कार्बाइड है।
छोटे उदाहरण
1. TiC
2. VN
3. Fe₃C
13. मिश्रधातु निर्माण (Alloy Formation)
परिभाषा
दो या अधिक धातुओं या धातु और अन्य तत्वों के ठोस मिश्रण से बनने वाले पदार्थ को मिश्रधातु कहते हैं।
संक्रमण तत्व मिश्रधातु क्यों बनाते हैं?
इनके परमाणुओं के आकार एक-दूसरे से बहुत अलग नहीं होते, इसलिए वे क्रिस्टल संरचना में एक-दूसरे के स्थान पर आसानी से आ सकते हैं।
मुख्य बिंदु
– मिश्रधातु अधिक कठोर हो सकती है।
– उसके गुण मूल धातुओं से अलग हो सकते हैं।
– उद्योगों में संक्रमण धातुओं की मिश्रधातुएँ बहुत उपयोगी हैं।
छोटे उदाहरण
1. Fe + Cr + Ni → स्टेनलेस स्टील
2. Cu + Zn → पीतल
3. Fe + C → इस्पात
14. पोटैशियम डाइक्रोमेट (Potassium Dichromate, K₂Cr₂O₇)
परिचय
K₂Cr₂O₇ नारंगी रंग का महत्वपूर्ण अकार्बनिक यौगिक है। इसका उपयोग मुख्यतः ऑक्सीकारक के रूप में किया जाता है।
ऑक्सीकरण अवस्था
K₂Cr₂O₇ में Cr की ऑक्सीकरण अवस्था +6 होती है।
अम्लीय माध्यम में ऑक्सीकारक गुण
अम्लीय माध्यम में डाइक्रोमेट आयन Cr³⁺ में अपचयित होता है।
Cr₂O₇²⁻ + 14H⁺ + 6e⁻ → 2Cr³⁺ + 7H₂O
इससे स्पष्ट है कि Cr की ऑक्सीकरण अवस्था +6 से घटकर +3 हो जाती है।
मुख्य बिंदु
– K₂Cr₂O₇ का रंग नारंगी होता है।
– अम्लीय माध्यम में यह शक्तिशाली ऑक्सीकारक है।
– इसमें Cr की ऑक्सीकरण अवस्था +6 है।
– प्रयोगशाला में इसका उपयोग ऑक्सीकरण अभिक्रियाओं में किया जाता है।
छोटे उदाहरण
1. Fe²⁺ को Fe³⁺ में ऑक्सीकृत कर सकता है।
2. I⁻ को I₂ में ऑक्सीकृत कर सकता है।
3. अम्लीय माध्यम में स्वयं Cr³⁺ में अपचयित होता है।
15. पोटैशियम परमैंगनेट (Potassium Permanganate, KMnO₄)
परिचय
KMnO₄ गहरे बैंगनी रंग का यौगिक है और एक शक्तिशाली ऑक्सीकारक के रूप में जाना जाता है।
ऑक्सीकरण अवस्था
KMnO₄ में Mn की ऑक्सीकरण अवस्था +7 होती है।
अम्लीय माध्यम में अपचयन
अम्लीय माध्यम में—
MnO₄⁻ + 8H⁺ + 5e⁻ → Mn²⁺ + 4H₂O
यहाँ Mn की ऑक्सीकरण अवस्था +7 से घटकर +2 हो जाती है।
मुख्य बिंदु
– KMnO₄ का रंग बैंगनी होता है।
– यह शक्तिशाली ऑक्सीकारक है।
– अम्लीय माध्यम में Mn²⁺ बनता है।
– इसका उपयोग विभिन्न ऑक्सीकरण अभिक्रियाओं में किया जाता है।
छोटे उदाहरण
1. Fe²⁺ को Fe³⁺ में ऑक्सीकृत करता है।
2. ऑक्सेलेट आयन का ऑक्सीकरण कर सकता है।
3. अम्लीय माध्यम में स्वयं Mn²⁺ बनाता है।
16. K₂Cr₂O₇ और KMnO₄ की तुलना (Comparison)
गुण| K₂Cr₂O₇| KMnO₄
रंग| नारंगी| बैंगनी
मुख्य तत्व| Cr| Mn
ऑक्सीकरण अवस्था| +6| +7
अम्लीय माध्यम में अपचयन| Cr³⁺| Mn²⁺
प्रकृति| ऑक्सीकारक| ऑक्सीकारक
याद रखने की आसान बात
डाइक्रोमेट = नारंगी → Cr³⁺
परमैंगनेट = बैंगनी → Mn²⁺
17. लैन्थेनॉयड (Lanthanoids)
परिभाषा
वे आंतरिक संक्रमण तत्व जिनमें 4f उपकोश क्रमशः भरता है और जो सामान्यतः Ce से Lu तक माने जाते हैं, लैन्थेनॉयड कहलाते हैं।
सामान्य इलेक्ट्रॉनिक विन्यास
[Xe] 4f⁰–¹⁴ 5d⁰–¹ 6s²
मुख्य बिंदु
– इनमें 4f उपकोश भरता है।
– अधिकांश की प्रमुख ऑक्सीकरण अवस्था +3 है।
– ये सामान्यतः चाँदी जैसे चमकीले धातु होते हैं।
– इनके आयनों में चुंबकीय गुण पाए जा सकते हैं।
– इनके आकार में क्रमिक कमी लैन्थेनॉयड संकुचन कहलाती है।
छोटे उदाहरण
1. Ce
2. Nd
3. Eu
18. लैन्थेनॉयड की ऑक्सीकरण अवस्थाएँ (Oxidation States of Lanthanoids)
परिभाषा
लैन्थेनॉयड तत्वों द्वारा यौगिकों में प्रदर्शित धनात्मक आवेश की अवस्थाओं को उनकी ऑक्सीकरण अवस्थाएँ कहते हैं।
मुख्य जानकारी
लैन्थेनॉयड की सबसे सामान्य ऑक्सीकरण अवस्था +3 है।
कुछ तत्व +2 या +4 अवस्था भी दिखाते हैं, क्योंकि कुछ विशेष इलेक्ट्रॉनिक विन्यास अतिरिक्त स्थिरता प्रदान करते हैं।
मुख्य बिंदु
– +3 सबसे सामान्य अवस्था है।
– Ce⁴⁺ अपेक्षाकृत महत्वपूर्ण है।
– Eu²⁺ और Yb²⁺ विशेष रूप से स्थिर अवस्थाएँ दिखा सकते हैं।
छोटे उदाहरण
1. Ce³⁺
2. Ce⁴⁺
3. Eu²⁺
19. लैन्थेनॉयड संकुचन (Lanthanoid Contraction)
परिभाषा
La से Lu की ओर जाने पर लैन्थेनॉयड तत्वों के परमाणु तथा आयनिक आकार में होने वाली क्रमिक कमी को लैन्थेनॉयड संकुचन कहते हैं।
कारण
4f इलेक्ट्रॉनों की परिरक्षण क्षमता कमजोर होती है। इसलिए परमाणु क्रमांक बढ़ने पर नाभिकीय आकर्षण प्रभावी रूप से बढ़ता जाता है और आकार घटता जाता है।
मुख्य बिंदु
– La → Lu की ओर आकार घटता है।
– 4f इलेक्ट्रॉन अच्छा परिरक्षण नहीं देते।
– यह घटना आगे के तत्वों के गुणों को भी प्रभावित करती है।
लैन्थेनॉयड संकुचन के प्रभाव
1. लैन्थेनॉयड के आकार में कमी
श्रृंखला में आगे बढ़ने पर आकार लगातार कम होता है।
2. Zr और Hf की समानता
लैन्थेनॉयड संकुचन के कारण Zr और Hf की परमाणु त्रिज्याएँ बहुत करीब हो जाती हैं।
3. लैन्थेनॉयड के पृथक्करण में कठिनाई
इनके आयनिक आकार बहुत समान होने के कारण इन्हें अलग करना कठिन होता है।
छोटे उदाहरण
1. La³⁺ की त्रिज्या Lu³⁺ से अधिक होती है।
2. Zr और Hf के आकार बहुत समान हैं।
3. इसी समानता के कारण इनके रासायनिक गुणों में भी काफी समानता दिखाई देती है।
20. लैन्थेनॉयड की रासायनिक अभिक्रियाशीलता (Chemical Reactivity of Lanthanoids)
मुख्य जानकारी
लैन्थेनॉयड सामान्यतः विद्युतधनात्मक होते हैं और विभिन्न अधातुओं के साथ अभिक्रिया कर सकते हैं।
मुख्य बिंदु
– ऑक्सीजन के साथ ऑक्साइड बना सकते हैं।
– हैलोजन के साथ हैलाइड बनाते हैं।
– जल के साथ अभिक्रिया करके हाइड्रोजन उत्पन्न कर सकते हैं।
– अम्लों के साथ सामान्यतः अभिक्रिया करते हैं।
छोटे उदाहरण
1. धातु + O₂ → धातु ऑक्साइड
2. धातु + Cl₂ → धातु क्लोराइड
3. धातु + अम्ल → लवण + H₂
21. एक्टिनॉयड (Actinoids)
परिभाषा
वे आंतरिक संक्रमण तत्व जिनमें 5f उपकोश क्रमशः भरता है और जो सामान्यतः Th से Lr तक माने जाते हैं, एक्टिनॉयड कहलाते हैं।
सामान्य इलेक्ट्रॉनिक विन्यास
[Rn] 5f⁰–¹⁴ 6d⁰–¹ 7s²
मुख्य बिंदु
– 5f उपकोश भरता है।
– अधिकांश एक्टिनॉयड रेडियोधर्मी होते हैं।
– इनमें अनेक ऑक्सीकरण अवस्थाएँ मिलती हैं।
– इनके रासायनिक गुणों में परिवर्तन लैन्थेनॉयड की तुलना में अधिक दिखाई देता है।
छोटे उदाहरण
1. Th
2. U
3. Pu
22. एक्टिनॉयड की ऑक्सीकरण अवस्थाएँ (Oxidation States of Actinoids)
मुख्य जानकारी
एक्टिनॉयड +3, +4, +5 और +6 जैसी कई ऑक्सीकरण अवस्थाएँ दिखा सकते हैं।
लैन्थेनॉयड की तुलना में एक्टिनॉयड में ऑक्सीकरण अवस्थाओं की विविधता अधिक होती है।
मुख्य बिंदु
– +3 अवस्था सामान्य है।
– कुछ एक्टिनॉयड +4, +5 और +6 भी दिखाते हैं।
– 5f, 6d और 7s इलेक्ट्रॉनों की भागीदारी के कारण विविधता अधिक होती है।
छोटे उदाहरण
1. Th⁴⁺
2. U⁶⁺
3. Pu⁴⁺
23. लैन्थेनॉयड और एक्टिनॉयड में अंतर (Lanthanoids vs Actinoids)
आधार| लैन्थेनॉयड| एक्टिनॉयड
भरने वाला उपकोश| 4f| 5f
सामान्य श्रेणी| Ce–Lu| Th–Lr
प्रमुख अवस्था| +3| +3
अन्य अवस्थाएँ| कुछ विशेष अवस्थाएँ| कई अवस्थाएँ
रेडियोधर्मिता| अधिकांश स्थिर| अधिकांश रेडियोधर्मी
इलेक्ट्रॉन की भागीदारी| 4f| 5f, 6d, 7s
ऑक्सीकरण अवस्था की विविधता| कम| अधिक
24. चार बहुत जरूरी तुलना
d-ब्लॉक और f-ब्लॉक
1. d-ब्लॉक में d-उपकोश भरता है।
2. f-ब्लॉक में f-उपकोश भरता है।
3. f-ब्लॉक तत्वों को आवर्त सारणी के नीचे अलग रखा जाता है।
लैन्थेनॉयड और एक्टिनॉयड
1. लैन्थेनॉयड में 4f भरता है।
2. एक्टिनॉयड में 5f भरता है।
3. एक्टिनॉयड में रेडियोधर्मिता अधिक महत्वपूर्ण है।
अध्याय का त्वरित रिवीजन (Quick Revision)
– d-ब्लॉक = समूह 3 से 12
– सामान्य d-ब्लॉक विन्यास = (n−1)d¹–¹⁰ ns⁰–²
– प्रथम संक्रमण श्रेणी = Sc से Zn
– संक्रमण तत्वों में परिवर्ती ऑक्सीकरण अवस्थाएँ सामान्य हैं।
– अधूरे d-उपकोश वाले आयन प्रायः रंगीन हो सकते हैं।
– अयुग्मित इलेक्ट्रॉन → अनुचुंबकीय व्यवहार।
– सभी इलेक्ट्रॉन युग्मित → प्रतिचुंबकीय व्यवहार।
– चुंबकीय आघूर्ण = √n(n+2) BM
– अंतराकाशी यौगिकों में छोटे परमाणु धातु जालक के रिक्त स्थानों में जाते हैं।
– संक्रमण तत्व आसानी से मिश्रधातु बना सकते हैं।
– K₂Cr₂O₇ नारंगी और शक्तिशाली ऑक्सीकारक है।
– KMnO₄ बैंगनी और शक्तिशाली ऑक्सीकारक है।
– K₂Cr₂O₇ में Cr = +6
– KMnO₄ में Mn = +7
– लैन्थेनॉयड में 4f भरता है।
– एक्टिनॉयड में 5f भरता है।
– La से Lu तक आकार में कमी = लैन्थेनॉयड संकुचन।
– लैन्थेनॉयड की प्रमुख ऑक्सीकरण अवस्था +3 है।
– एक्टिनॉयड में ऑक्सीकरण अवस्थाओं की विविधता अधिक है।
पूरे अध्याय के सभी जरूरी सूत्र
पूरे अध्याय के सभी जरूरी सूत्र
1. सामान्य d-ब्लॉक विन्यास
(n−1)d¹–¹⁰ ns⁰–²
2. चुंबकीय आघूर्ण
μ = √n(n + 2) BM
3. ऑक्सीकरण संख्या
तटस्थ यौगिक में—
ऑक्सीकरण संख्याओं का योग = 0
आयन में—
ऑक्सीकरण संख्याओं का योग = आयन का आवेश
4. K₂Cr₂O₇ में Cr
Cr = +6
5. KMnO₄ में Mn
Mn = +7
चुंबकीय आघूर्ण पर चार अभ्यास संख्यात्मक प्रश्न
प्रश्न 1
किसी आयन में 2 अयुग्मित इलेक्ट्रॉन हैं। उसका चुंबकीय आघूर्ण ज्ञात कीजिए।
उत्तर: √8 ≈ 2.83 BM
प्रश्न 2
किसी आयन में 4 अयुग्मित इलेक्ट्रॉन हैं। उसका चुंबकीय आघूर्ण ज्ञात कीजिए।
उत्तर: √24 ≈ 4.90 BM
प्रश्न 3
किसी आयन में 6 अयुग्मित इलेक्ट्रॉन हैं। क्या उसका चुंबकीय आघूर्ण ज्ञात किया जा सकता है?
उत्तर:
μ = √6(8) = √48
μ ≈ 6.93 BM
प्रश्न 4
किसी आयन में 3 अयुग्मित इलेक्ट्रॉन हैं। उसका चुंबकीय आघूर्ण ज्ञात कीजिए।
उत्तर:
μ = √3(5) = √15
μ ≈ 3.87 BM
ऑक्सीकरण अवस्था पर चार अभ्यास संख्यात्मक प्रश्न
प्रश्न 1
K₂MnO₄ में Mn की ऑक्सीकरण अवस्था ज्ञात कीजिए।
उत्तर: +6
प्रश्न 2
CrO₄²⁻ में Cr की ऑक्सीकरण अवस्था ज्ञात कीजिए।
उत्तर: +6
प्रश्न 3
MnO₂ में Mn की ऑक्सीकरण अवस्था ज्ञात कीजिए।
उत्तर: +4
प्रश्न 4
FeO में Fe की ऑक्सीकरण अवस्था ज्ञात कीजिए।
उत्तर: +2
परीक्षा के लिए जरूरी प्रश्न
प्रश्न 1
संक्रमण तत्वों को संक्रमण तत्व क्यों कहा जाता है?
उत्तर:
इन तत्वों में या इनके किसी आयन में d-उपकोश पूर्णतः भरा नहीं होता। d-इलेक्ट्रॉनों की उपस्थिति इनके विशेष रासायनिक गुणों का मुख्य कारण है।
प्रश्न 2
संक्रमण तत्व परिवर्ती ऑक्सीकरण अवस्थाएँ क्यों प्रदर्शित करते हैं?
उत्तर:
(ns) और (n−1)d कक्षकों की ऊर्जाएँ बहुत पास होती हैं। इसलिए दोनों के इलेक्ट्रॉन बंध निर्माण में भाग ले सकते हैं। इसी कारण संक्रमण तत्व अनेक ऑक्सीकरण अवस्थाएँ प्रदर्शित करते हैं।
प्रश्न 3
संक्रमण तत्वों के आयन रंगीन क्यों होते हैं?
उत्तर:
अधूरे d-उपकोश वाले आयनों में d-कक्षकों के बीच इलेक्ट्रॉन ऊर्जा ग्रहण करके स्थान बदल सकते हैं। दृश्य प्रकाश का कुछ भाग अवशोषित होने के कारण ऐसे आयन रंगीन दिखाई देते हैं।
प्रश्न 4
संक्रमण तत्व अच्छे उत्प्रेरक क्यों होते हैं?
उत्तर:
उनमें परिवर्ती ऑक्सीकरण अवस्थाएँ होती हैं और वे अभिकारकों के साथ अस्थायी मध्यवर्ती बना सकते हैं। इससे अभिक्रिया के लिए आसान वैकल्पिक मार्ग उपलब्ध हो जाता है।
प्रश्न 5
लैन्थेनॉयड संकुचन क्या है?
उत्तर:
La से Lu की ओर बढ़ने पर लैन्थेनॉयड परमाणुओं तथा आयनों की त्रिज्या में होने वाली क्रमिक कमी को लैन्थेनॉयड संकुचन कहते हैं। इसका मुख्य कारण 4f इलेक्ट्रॉनों की कमजोर परिरक्षण क्षमता है।
प्रश्न 6
K₂Cr₂O₇ और KMnO₄ में एक अंतर लिखिए।
उत्तर:
K₂Cr₂O₇ नारंगी रंग का होता है और इसमें Cr की ऑक्सीकरण अवस्था +6 होती है, जबकि KMnO₄ बैंगनी रंग का होता है और इसमें Mn की ऑक्सीकरण अवस्था +7 होती है।
प्रश्न 7
अंतराकाशी यौगिक क्या हैं?
उत्तर:
वे यौगिक जिनमें H, C या N जैसे छोटे परमाणु संक्रमण धातुओं के क्रिस्टल जालक के रिक्त स्थानों में प्रवेश कर जाते हैं, अंतराकाशी यौगिक कहलाते हैं।
प्रश्न 8
लैन्थेनॉयड और एक्टिनॉयड में मुख्य अंतर लिखिए।
उत्तर:
लैन्थेनॉयड में 4f उपकोश भरता है, जबकि एक्टिनॉयड में 5f उपकोश भरता है। एक्टिनॉयड सामान्यतः अधिक रेडियोधर्मी होते हैं और अधिक विविध ऑक्सीकरण अवस्थाएँ प्रदर्शित करते हैं।
जरूरी बातें
1. Sc से Zn = प्रथम संक्रमण श्रेणी।
2. d-ब्लॉक = समूह 3 से 12
3. d⁰ और d¹⁰ आयन सामान्यतः रंगहीन होते हैं।
4. अयुग्मित इलेक्ट्रॉन चुंबकीय व्यवहार का मुख्य कारण हैं।
5. Mn कई ऑक्सीकरण अवस्थाएँ प्रदर्शित करता है।
6. K₂Cr₂O₇ = नारंगी
7. KMnO₄ = बैंगनी
8. K₂Cr₂O₇ में Cr = +6
9. KMnO₄ में Mn = +7
10. लैन्थेनॉयड की प्रमुख अवस्था = +3
11. एक्टिनॉयड में ऑक्सीकरण अवस्थाओं की विविधता अधिक होती है।
12. La → Lu : आयनिक त्रिज्या घटती है।
13. लैन्थेनॉयड संकुचन का कारण = 4f इलेक्ट्रॉनों का कमजोर परिरक्षण।
14. अंतराकाशी यौगिक सामान्यतः कठोर होते हैं।
15. संक्रमण तत्व मिश्रधातु निर्माण में महत्वपूर्ण हैं।
अब खुद जाँचकर देखो
नीचे दिए प्रश्नों के उत्तर बिना नोट्स देखे लिखने की कोशिश करो।
1.
d-ब्लॉक तत्वों का सामान्य इलेक्ट्रॉनिक विन्यास लिखिए।
2.
संक्रमण तत्व की परिभाषा लिखिए।
3.
संक्रमण तत्व परिवर्ती ऑक्सीकरण अवस्था क्यों दिखाते हैं?
4.
d-ब्लॉक तत्वों के आयन रंगीन क्यों होते हैं?
5.
अनुचुंबकीय और प्रतिचुंबकीय पदार्थ में अंतर लिखिए।
6.
चुंबकीय आघूर्ण का सूत्र लिखिए।
7.
किसी आयन में 2 अयुग्मित इलेक्ट्रॉन हैं। उसका चुंबकीय आघूर्ण ज्ञात कीजिए।
8.
K₂Cr₂O₇ में Cr की ऑक्सीकरण अवस्था ज्ञात कीजिए।
9.
KMnO₄ में Mn की ऑक्सीकरण अवस्था ज्ञात कीजिए।
10.
अंतराकाशी यौगिक क्या हैं?
11.
मिश्रधातु किसे कहते हैं?
12.
K₂Cr₂O₇ और KMnO₄ के रंग लिखिए।
13.
लैन्थेनॉयड संकुचन की परिभाषा लिखिए।
14.
लैन्थेनॉयड संकुचन का एक कारण और दो प्रभाव लिखिए।
15.
लैन्थेनॉयड की प्रमुख ऑक्सीकरण अवस्था कौन-सी है?
16.
एक्टिनॉयड की सामान्य इलेक्ट्रॉनिक विन्यास लिखिए।
17.
लैन्थेनॉयड और एक्टिनॉयड में तीन अंतर लिखिए।
स्वयं-जाँच के उत्तर
1. (n−1)d¹–¹⁰ ns⁰–²
2. वे तत्व जिनके परमाणु या किसी आयन में d-उपकोश पूर्णतः भरा नहीं होता, संक्रमण तत्व कहलाते हैं।
3. ns और (n−1)d कक्षकों की ऊर्जाएँ पास होने के कारण दोनों के इलेक्ट्रॉन बंध निर्माण में भाग ले सकते हैं।
4. अधूरे d-उपकोश में इलेक्ट्रॉन d-कक्षकों के बीच ऊर्जा ग्रहण करके स्थान बदल सकते हैं, इसलिए दृश्य प्रकाश का कुछ भाग अवशोषित होता है।
5. अयुग्मित इलेक्ट्रॉन वाले पदार्थ अनुचुंबकीय तथा सभी इलेक्ट्रॉन युग्मित वाले पदार्थ प्रतिचुंबकीय होते हैं।
6. μ = √n(n + 2) BM
7. μ = √8 ≈ 2.83 BM
8. Cr = +6
9. Mn = +7
10. छोटे परमाणुओं के संक्रमण धातु के क्रिस्टल जालक के रिक्त स्थानों में प्रवेश करने से बने यौगिक अंतराकाशी यौगिक कहलाते हैं।
11. दो या अधिक धातुओं अथवा धातु और अन्य तत्व के ठोस मिश्रण को मिश्रधातु कहते हैं।
12. K₂Cr₂O₇ = नारंगी, KMnO₄ = बैंगनी।
13. La से Lu की ओर परमाणु तथा आयनिक त्रिज्या में होने वाली क्रमिक कमी लैन्थेनॉयड संकुचन कहलाती है।
14. कारण—4f इलेक्ट्रॉनों की कमजोर परिरक्षण क्षमता। प्रभाव—Zr और Hf की समानता तथा लैन्थेनॉयडों को अलग करने में कठिनाई।
15. +3
16. [Rn] 5f⁰–¹⁴ 6d⁰–¹ 7s²
17. लैन्थेनॉयड में 4f उपकोश भरता है, एक्टिनॉयड में 5f; लैन्थेनॉयड अधिकांशतः स्थिर होते हैं जबकि एक्टिनॉयड सामान्यतः रेडियोधर्मी; एक्टिनॉयड अधिक विविध ऑक्सीकरण अवस्थाएँ दिखाते हैं।
अंत में एक नजर
अगर इस पूरे अध्याय को बहुत कम शब्दों में याद करना हो, तो बस यह क्रम दिमाग में रखो—
d-ब्लॉक → संक्रमण तत्व → d-विन्यास → परिवर्ती ऑक्सीकरण अवस्था → रंग → चुंबकत्व → उत्प्रेरक → अंतराकाशी यौगिक → मिश्रधातु → K₂Cr₂O₇ → KMnO₄ → लैन्थेनॉयड → लैन्थेनॉयड संकुचन → एक्टिनॉयड।