अध्याय 5 : उपसहसंयोजन यौगिक (Coordination Compounds)
अध्याय की महत्वपूर्ण परिभाषाएँ
1. उपसहसंयोजन यौगिक (Coordination Compound)
वह यौगिक जिसमें एक केंद्रीय धातु परमाणु या आयन के साथ लिगैंड उपसहसंयोजक बंध द्वारा जुड़े होते हैं, उपसहसंयोजन यौगिक कहलाता है।
2. केंद्रीय धातु आयन (Central Metal Ion)
उपसहसंयोजन यौगिक के केंद्र में स्थित वह धातु परमाणु या आयन, जो लिगैंडों से जुड़ता है, केंद्रीय धातु आयन कहलाता है।
3. लिगैंड (Ligand)
वह आयन या अणु जो केंद्रीय धातु आयन को इलेक्ट्रॉन-युग्म प्रदान करके उससे उपसहसंयोजक बंध बनाता है, लिगैंड कहलाता है।
4. दाता परमाणु (Donor Atom)
लिगैंड का वह परमाणु जो अपना एकाकी इलेक्ट्रॉन-युग्म केंद्रीय धातु को देता है, दाता परमाणु कहलाता है।
5. उपसहसंयोजन संख्या (Coordination Number)
केंद्रीय धातु से सीधे जुड़े दाता परमाणुओं की कुल संख्या को उपसहसंयोजन संख्या कहते हैं।
6. उपसहसंयोजन क्षेत्र (Coordination Sphere)
वर्ग कोष्ठक [ ] के अंदर उपस्थित केंद्रीय धातु और उससे सीधे जुड़े लिगैंडों के पूरे समूह को उपसहसंयोजन क्षेत्र कहते हैं।
7. समन्वयक आयन / जटिल आयन (Complex Ion)
केंद्रीय धातु आयन और उससे जुड़े लिगैंडों से बना आवेशित समूह जटिल आयन कहलाता है।
8. एकदंती लिगैंड (Monodentate Ligand)
जो लिगैंड केंद्रीय धातु से केवल एक दाता परमाणु द्वारा जुड़ता है, एकदंती लिगैंड कहलाता है।
उदाहरण—Cl⁻, NH₃, H₂O
9. द्विदंती लिगैंड (Bidentate Ligand)
जो लिगैंड दो दाता परमाणुओं द्वारा केंद्रीय धातु से जुड़ता है, द्विदंती लिगैंड कहलाता है।
उदाहरण—ethane-1,2-diamine (en), C₂O₄²⁻
10. बहुदंती लिगैंड (Polydentate Ligand)
जो लिगैंड दो से अधिक दाता परमाणुओं द्वारा केंद्रीय धातु से जुड़ सकता है, बहुदंती लिगैंड कहलाता है।
11. उभयदंती लिगैंड (Ambidentate Ligand)
वह लिगैंड जो दो अलग-अलग दाता परमाणुओं में से किसी एक के माध्यम से केंद्रीय धातु से जुड़ सकता है, उभयदंती लिगैंड कहलाता है।
उदाहरण—NO₂⁻, SCN⁻
12. कीलेट (Chelate)
जब कोई बहुदंती लिगैंड केंद्रीय धातु के साथ जुड़कर एक या अधिक वलय बना देता है, तो बने हुए चक्रीय समूह को कीलेट कहते हैं।
13. कीलेटिंग लिगैंड (Chelating Ligand)
जो लिगैंड केंद्रीय धातु से एक से अधिक स्थानों पर जुड़कर वलय बनाता है, कीलेटिंग लिगैंड कहलाता है।
14. प्राथमिक संयोजकता (Primary Valency)
वर्नर के अनुसार केंद्रीय धातु की वह संयोजकता जो सामान्यतः उसकी ऑक्सीकरण अवस्था के बराबर होती है और आयनीकरण योग्य होती है, प्राथमिक संयोजकता कहलाती है।
15. द्वितीयक संयोजकता (Secondary Valency)
केंद्रीय धातु की वह संयोजकता जो उससे जुड़े लिगैंडों की संख्या और उपसहसंयोजन संख्या निर्धारित करती है, द्वितीयक संयोजकता कहलाती है।
16. समावयवता (Isomerism)
जब समान आणविक सूत्र वाले दो या अधिक उपसहसंयोजन यौगिकों की संरचना या परमाणुओं की व्यवस्था अलग हो, तो इस गुण को समावयवता कहते हैं।
17. ज्यामितीय समावयवता (Geometrical Isomerism)
जब लिगैंडों की स्थानिक व्यवस्था अलग होने से cis और trans जैसे समावयवी बनते हैं, तो इसे ज्यामितीय समावयवता कहते हैं।
18. प्रकाशीय समावयवता (Optical Isomerism)
जब दो समावयवी एक-दूसरे के दर्पण प्रतिबिम्ब हों लेकिन एक-दूसरे पर अध्यारोपित न हो सकें, तो प्रकाशीय समावयवता कहलाती है।
19. क्रिस्टल क्षेत्र विभाजन (Crystal Field Splitting)
लिगैंडों के प्रभाव से केंद्रीय धातु के समान ऊर्जा वाले d-कक्षकों की ऊर्जा के अलग-अलग स्तरों में विभाजित होने की घटना को क्रिस्टल क्षेत्र विभाजन कहते हैं।
20. क्रिस्टल क्षेत्र स्थिरीकरण ऊर्जा (Crystal Field Stabilisation Energy)
क्रिस्टल क्षेत्र में d-कक्षकों के विभाजन के कारण संकुल को मिलने वाली स्थिरता से संबंधित ऊर्जा को क्रिस्टल क्षेत्र स्थिरीकरण ऊर्जा कहते हैं।
21. उच्च चक्रण संकुल (High Spin Complex)
जिस संकुल में संभवतः अधिकतम अयुग्मित इलेक्ट्रॉन पाए जाते हैं, उसे उच्च चक्रण संकुल कहते हैं।
22. निम्न चक्रण संकुल (Low Spin Complex)
जिस संकुल में युग्मन अधिक होने के कारण अयुग्मित इलेक्ट्रॉनों की संख्या कम होती है, उसे निम्न चक्रण संकुल कहते हैं।
1. उपसहसंयोजन यौगिक का परिचय (Introduction to Coordination Compounds)
परिभाषा
वे यौगिक जिनमें केंद्रीय धातु आयन के चारों ओर लिगैंड उपसहसंयोजक बंध द्वारा व्यवस्थित रहते हैं, उपसहसंयोजन यौगिक कहलाते हैं।
उदाहरण—
[Cu(NH₃)₄]SO₄
इसमें Cu²⁺ केंद्रीय धातु आयन है और NH₃ लिगैंड है।
संरचना को समझें
[Cu(NH₃)₄]²⁺
Cu²⁺ → केंद्रीय धातु आयन
NH₃ → लिगैंड
4 → उपसहसंयोजन संख्या
मुख्य बिंदु
– केंद्रीय धातु इलेक्ट्रॉन-युग्म स्वीकार करती है।
– लिगैंड इलेक्ट्रॉन-युग्म देता है।
– धातु और लिगैंड के बीच उपसहसंयोजक बंध बनता है।
– वर्ग कोष्ठक उपसहसंयोजन क्षेत्र को दर्शाते हैं।
विशेषताएँ
– निश्चित उपसहसंयोजन संख्या हो सकती है।
– अलग-अलग आकृतियाँ बन सकती हैं।
– इनके रंग और चुंबकीय गुण अलग-अलग हो सकते हैं।
– एक ही धातु अलग-अलग लिगैंड के साथ अलग संकुल बना सकती है।
छोटे उदाहरण
(i) [Cu(NH₃)₄]²⁺
(ii) [Ag(NH₃)₂]⁺
(iii) [Co(NH₃)₆]³⁺
2. लिगैंड (Ligand)
परिभाषा
वह आयन या अणु जो अपने एकाकी इलेक्ट्रॉन-युग्म को केंद्रीय धातु आयन को देकर उपसहसंयोजक बंध बनाता है, लिगैंड कहलाता है।
कुछ सामान्य लिगैंड
लिगैंड| नाम| दाता परमाणु
NH₃| अमोनिया| N
H₂O| जल| O
Cl⁻| क्लोराइड| Cl
CN⁻| सायनाइड| C
CO| कार्बोनिल| C
OH⁻| हाइड्रॉक्साइड| O
मुख्य बिंदु
– लिगैंड में कम से कम एक एकाकी इलेक्ट्रॉन-युग्म होना चाहिए।
– दाता परमाणु केंद्रीय धातु से जुड़ता है।
– लिगैंड एकदंती या बहुदंती हो सकता है।
उदाहरण
(i) NH₃ अपना इलेक्ट्रॉन-युग्म N से देता है।
(ii) H₂O अपना इलेक्ट्रॉन-युग्म O से देता है।
(iii) CN⁻ धातु से C परमाणु के द्वारा जुड़ सकता है।
3. लिगैंड की दंतता (Denticity of Ligand)
परिभाषा
किसी लिगैंड के जितने दाता परमाणु एक ही केंद्रीय धातु से सीधे जुड़ सकते हैं, उसे उस लिगैंड की दंतता कहते हैं।
उदाहरण
NH₃ → दंतता = 1
en → दंतता = 2
C₂O₄²⁻ → दंतता = 2
मुख्य बिंदु
– एकदंती लिगैंड एक स्थान से जुड़ता है।
– द्विदंती दो स्थानों से जुड़ता है।
– बहुदंती कई स्थानों से जुड़ सकता है।
विशेष बात
दंतता को केवल लिगैंड में उपस्थित दाता परमाणुओं की कुल संख्या समझना सही नहीं है; देखना यह होता है कि वे एक ही केंद्रीय धातु से कितने स्थानों पर सीधे जुड़ रहे हैं।
4. उपसहसंयोजन संख्या (Coordination Number)
परिभाषा
केंद्रीय धातु आयन से सीधे जुड़े दाता परमाणुओं की कुल संख्या को उपसहसंयोजन संख्या कहते हैं।
उदाहरण
[Co(NH₃)₆]³⁺
Co से 6 N परमाणु जुड़े हैं।
इसलिए—
उपसहसंयोजन संख्या = 6
मुख्य बिंदु
– एकदंती लिगैंडों के मामले में लिगैंडों की संख्या ही सामान्यतः उपसहसंयोजन संख्या होती है।
– बहुदंती लिगैंड में दाता परमाणुओं की संख्या गिनी जाती है।
– यह संकुल की आकृति समझने में भी मदद करती है।
चार अभ्यास प्रश्न
प्रश्न 1: [Ag(NH₃)₂]⁺ की उपसहसंयोजन संख्या क्या है?
उत्तर: 2
प्रश्न 2: [Co(NH₃)₆]³⁺ की उपसहसंयोजन संख्या क्या है?
उत्तर: 6
प्रश्न 3: [PtCl₄]²⁻ की उपसहसंयोजन संख्या क्या है?
उत्तर: 4
प्रश्न 4: [Fe(C₂O₄)₃]³⁻ में Fe की उपसहसंयोजन संख्या क्या है?
एक C₂O₄²⁻ लिगैंड दो दाता परमाणुओं से जुड़ता है।
3 × 2 = 6
उत्तर: 6
5. वर्नर का सिद्धांत (Werner’s Theory)
परिभाषा
वर्नर ने उपसहसंयोजन यौगिकों की संरचना समझाने के लिए प्राथमिक और द्वितीयक संयोजकताओं की अवधारणा दी।
वर्नर सिद्धांत की मुख्य बातें
1. धातु की दो प्रकार की संयोजकताएँ होती हैं।
2. प्राथमिक संयोजकता उसकी ऑक्सीकरण अवस्था से जुड़ी होती है।
3. प्राथमिक संयोजकता आयनीकरण योग्य होती है।
4. द्वितीयक संयोजकता उपसहसंयोजन संख्या से जुड़ी होती है।
5. द्वितीयक संयोजकता दिशात्मक होती है।
6. द्वितीयक संयोजकता संकुल की आकृति निर्धारित करने में सहायता करती है।
उदाहरण
[Co(NH₃)₆]Cl₃
Co की प्राथमिक संयोजकता = +3
द्वितीयक संयोजकता = 6
अतः तीन Cl⁻ आयन उपसहसंयोजन क्षेत्र के बाहर हैं।
मुख्य बात
[ ] के अंदर का भाग = उपसहसंयोजन क्षेत्र
[ ] के बाहर के आयन = सामान्यतः आयनीकरण योग्य आयन
6. उपसहसंयोजन यौगिकों का नामकरण (Nomenclature of Coordination Compounds)
नामकरण के मुख्य नियम
1. पहले धनायन का नाम लिखा जाता है।
2. उसके बाद ऋणायन का नाम लिखा जाता है।
3. संकुल के अंदर पहले लिगैंडों के नाम लिखे जाते हैं।
4. लिगैंडों की संख्या बताने के लिए di, tri, tetra, penta, hexa आदि प्रयोग किए जाते हैं।
5. उसके बाद केंद्रीय धातु का नाम आता है।
6. संकुल ऋणात्मक हो तो धातु के नाम के अंत में सामान्यतः -ate रूप आता है।
7. केंद्रीय धातु की ऑक्सीकरण अवस्था रोमन अंक में लिखी जाती है।
उदाहरण 1
[Co(NH₃)₆]Cl₃
नाम—
हेक्साअम्मीनकोबाल्ट(III) क्लोराइड
उदाहरण 2
K₄[Fe(CN)₆]
नाम—
पोटैशियम हेक्सासायनोफेरेट(II)
उदाहरण 3
[Cu(NH₃)₄]SO₄
नाम—
टेट्राअम्मीनकॉपर(II) सल्फेट
मुख्य बिंदु
– धातु की ऑक्सीकरण अवस्था निकालना बहुत जरूरी है।
– लिगैंड के नाम और संख्या में गलती नहीं करनी चाहिए।
– ऋणात्मक संकुल में धातु के नाम का रूप बदलता है।
चार अभ्यास प्रश्न
प्रश्न 1: [Ag(NH₃)₂]Cl का नाम लिखिए।
उत्तर: डायअम्मीनसिल्वर(I) क्लोराइड
प्रश्न 2: [Co(NH₃)₆]Cl₃ का नाम लिखिए।
उत्तर: हेक्साअम्मीनकोबाल्ट(III) क्लोराइड
प्रश्न 3: K₄[Fe(CN)₆] का नाम लिखिए।
उत्तर: पोटैशियम हेक्सासायनोफेरेट(II)
प्रश्न 4: K₃[Fe(CN)₆] का नाम लिखिए।
Fe की अवस्था:
3(+1) + Fe + 6(−1) = 0
Fe = +3
उत्तर: पोटैशियम हेक्सासायनोफेरेट(III)
7. संकुल की ऑक्सीकरण अवस्था निकालना (Oxidation State in Complex)
नियम
संकुल में सभी परमाणुओं/आयनों की ऑक्सीकरण संख्याओं का योग संकुल के कुल आवेश के बराबर होता है।
उदाहरण
[Fe(CN)₆]⁴⁻
मान लेते हैं Fe की अवस्था = x
CN⁻ = −1
x + 6(−1) = −4
x − 6 = −4
x = +2
अतः Fe की ऑक्सीकरण अवस्था +2 है।
चार संख्यात्मक प्रश्न
प्रश्न 1: [Co(NH₃)₆]Cl₃ में Co की अवस्था ज्ञात कीजिए।
NH₃ = 0
संकुल का आवेश = +3
Co = +3
प्रश्न 2: [Fe(CN)₆]³⁻ में Fe की अवस्था ज्ञात कीजिए।
x − 6 = −3
x = +3
प्रश्न 3: [Cu(NH₃)₄]²⁺ में Cu की अवस्था ज्ञात कीजिए।
x + 0 = +2
Cu = +2
प्रश्न 4: [PtCl₆]²⁻ में Pt की अवस्था ज्ञात कीजिए।
x + 6(−1) = −2
x = +4
Pt = +4
8. उपसहसंयोजन यौगिकों की आकृतियाँ (Shapes of Coordination Compounds)
परिभाषा
केंद्रीय धातु के चारों ओर लिगैंड किस स्थानिक व्यवस्था में स्थित हैं, उस व्यवस्था को संकुल की आकृति कहते हैं।
प्रमुख आकृतियाँ
उपसहसंयोजन संख्या 2 → रैखिक (Linear)
उदाहरण—[Ag(NH₃)₂]⁺
उपसहसंयोजन संख्या 4 → चतुष्फलकीय या वर्ग समतलीय
उदाहरण—[NiCl₄]²⁻ → चतुष्फलकीय
[PtCl₄]²⁻ → वर्ग समतलीय
उपसहसंयोजन संख्या 6 → अष्टफलकीय
उदाहरण—[Co(NH₃)₆]³⁺
मुख्य बिंदु
– आकृति केवल उपसहसंयोजन संख्या देखकर हमेशा निश्चित नहीं होती।
– धातु, लिगैंड और इलेक्ट्रॉनिक संरचना भी प्रभाव डालती है।
– C.N. = 4 में tetrahedral और square planar दोनों संभव हैं।
9. समावयवता (Isomerism)
परिभाषा
समान आणविक सूत्र वाले ऐसे उपसहसंयोजन यौगिक जिनमें संरचना या परमाणुओं की व्यवस्था अलग हो, समावयवी कहलाते हैं।
मुख्य प्रकार
संरचनात्मक समावयवता
– आयनीकरण समावयवता
– जलयोजित समावयवता
– लिंकेज समावयवता
– उपसहसंयोजन समावयवता
त्रिविम समावयवता
– ज्यामितीय समावयवता
– प्रकाशीय समावयवता
10. आयनीकरण समावयवता (Ionisation Isomerism)
परिभाषा
जब संकुल के अंदर और बाहर उपस्थित आयन आपस में स्थान बदल लेते हैं और अलग-अलग आयन विलयन में देते हैं, तो आयनीकरण समावयवता कहलाती है।
उदाहरण
[Co(NH₃)₅Br]SO₄
और
[Co(NH₃)₅SO₄]Br
दोनों के सूत्र समान प्रकार के हैं, लेकिन विलयन में अलग आयन उत्पन्न करते हैं।
11. जलयोजित समावयवता (Hydrate Isomerism)
परिभाषा
जब जल के अणु कभी उपसहसंयोजन क्षेत्र के अंदर और कभी बाहर उपस्थित होकर अलग-अलग समावयवी बनाते हैं, तो जलयोजित समावयवता कहलाती है।
उदाहरण
क्रोमियम के जलयोजित क्लोराइडों में जल की स्थिति बदलने से अलग समावयवी प्राप्त हो सकते हैं।
12. लिंकेज समावयवता (Linkage Isomerism)
परिभाषा
जब उभयदंती लिगैंड अलग-अलग दाता परमाणुओं के माध्यम से केंद्रीय धातु से जुड़ता है, तो बने हुए यौगिक लिंकेज समावयवी कहलाते हैं।
उदाहरण
NO₂⁻ नाइट्रो या नाइट्रिटो रूप में जुड़ सकता है।
M—NO₂
और
M—ONO
मुख्य बिंदु
– इसमें लिगैंड नहीं बदलता।
– केवल जुड़ने वाला दाता परमाणु बदलता है।
– NO₂⁻ और SCN⁻ इसके सामान्य उदाहरण हैं।
13. ज्यामितीय समावयवता (Geometrical Isomerism)
परिभाषा
जब समान लिगैंडों की आपसी स्थिति बदलने से अलग-अलग स्थानिक व्यवस्था वाले संकुल बनते हैं, तो ज्यामितीय समावयवता कहलाती है।
Cis
समान लिगैंड पास-पास हों।
Trans
समान लिगैंड आमने-सामने हों।
उदाहरण
[Pt(NH₃)₂Cl₂]
इसके cis और trans दोनों रूप हो सकते हैं।
छोटे उदाहरण
(i) cis-[Pt(NH₃)₂Cl₂]
(ii) trans-[Pt(NH₃)₂Cl₂]
(iii) cis और trans व्यवस्था में समान लिगैंडों की स्थिति बदलती है।
14. प्रकाशीय समावयवता (Optical Isomerism)
परिभाषा
जब किसी संकुल के दो रूप एक-दूसरे के दर्पण प्रतिबिम्ब हों लेकिन एक-दूसरे पर पूरी तरह न चढ़ सकें, तो वे प्रकाशीय समावयवी कहलाते हैं।
मुख्य बिंदु
– ऐसे यौगिक ध्रुवित प्रकाश के प्रति अलग व्यवहार कर सकते हैं।
– दोनों रूप एक-दूसरे के दर्पण प्रतिबिम्ब होते हैं।
– यह त्रिविम संरचना से जुड़ी समावयवता है।
15. उपसहसंयोजन यौगिकों में बंधन (Bonding in Coordination Compounds)
इस अध्याय में बंधन समझाने के लिए मुख्यतः दो विचार महत्वपूर्ण हैं—
1. संयोजकता बंध सिद्धांत (VBT)
2. क्रिस्टल क्षेत्र सिद्धांत (CFT)
16. संयोजकता बंध सिद्धांत (Valence Bond Theory)
परिभाषा
VBT के अनुसार केंद्रीय धातु के उपयुक्त परमाणु कक्षक लिगैंड द्वारा दिए गए इलेक्ट्रॉन-युग्म को स्वीकार करके संकर कक्षक बनाते हैं और उपसहसंयोजक बंध बनाते हैं।
मुख्य विचार
– लिगैंड इलेक्ट्रॉन-युग्म दान करता है।
– धातु खाली कक्षक उपलब्ध कराती है।
– कक्षकों के संकरण से संकुल की आकृति समझाई जाती है।
प्रमुख संकरण
sp → रैखिक
sp³ → चतुष्फलकीय
dsp² → वर्ग समतलीय
d²sp³ → अष्टफलकीय
sp³d² → अष्टफलकीय
उदाहरण
[Ni(CN)₄]²⁻
Ni²⁺ = 3d⁸
CN⁻ मजबूत लिगैंड है, इसलिए इलेक्ट्रॉन युग्मित हो सकते हैं और dsp² संकरण के साथ वर्ग समतलीय आकृति मिल सकती है।
17. क्रिस्टल क्षेत्र सिद्धांत (Crystal Field Theory)
परिभाषा
क्रिस्टल क्षेत्र सिद्धांत में धातु आयन और लिगैंड के बीच विद्युतस्थैतिक आकर्षण के कारण धातु के d-कक्षकों की ऊर्जा अलग-अलग होने को समझाया जाता है।
मुख्य विचार
मुक्त धातु आयन में पाँचों d-कक्षकों की ऊर्जा समान मानी जाती है। लिगैंड पास आने पर उनके विद्युत क्षेत्र के कारण d-कक्षकों की ऊर्जा समान नहीं रहती।
इस विभाजन को क्रिस्टल क्षेत्र विभाजन कहते हैं।
18. अष्टफलकीय संकुल में d-कक्षक विभाजन (d-Orbital Splitting in Octahedral Complex)
अष्टफलकीय क्षेत्र में पाँच d-कक्षक दो समूहों में विभाजित होते हैं—
t₂g → कम ऊर्जा
eᵍ → अधिक ऊर्जा
ऊर्जा का अंतर—
Δ₀
मुख्य बिंदु
– t₂g कक्षक अपेक्षाकृत कम ऊर्जा वाले होते हैं।
– eᵍ कक्षक अधिक ऊर्जा वाले होते हैं।
– मजबूत और कमजोर लिगैंड के कारण इलेक्ट्रॉनों की व्यवस्था बदल सकती है।
19. चतुष्फलकीय संकुल में d-कक्षक विभाजन (d-Orbital Splitting in Tetrahedral Complex)
चतुष्फलकीय क्षेत्र में d-कक्षकों का विभाजन अष्टफलकीय क्षेत्र के विपरीत क्रम में होता है।
e → कम ऊर्जा
t₂ → अधिक ऊर्जा
विभाजन ऊर्जा—
Δₜ
संबंध
Δₜ ≈ 4/9 Δ₀
इसलिए चतुष्फलकीय संकुलों में सामान्यतः इलेक्ट्रॉन युग्मन की संभावना कम होती है।
20. रंग का कारण (Origin of Colour)
परिभाषा
संकुल में d-कक्षकों के बीच इलेक्ट्रॉन के ऊर्जा ग्रहण करके एक ऊर्जा स्तर से दूसरे स्तर पर जाने के कारण प्रकाश के कुछ भाग का अवशोषण होता है और संकुल रंगीन दिखाई दे सकता है।
मुख्य बिंदु
– रंग d-कक्षक विभाजन से जुड़ा है।
– अवशोषित प्रकाश की ऊर्जा Δ से संबंधित होती है।
– d⁰ और d¹⁰ विन्यास वाले अनेक संकुल सामान्यतः d-d संक्रमण के कारण रंग नहीं दिखाते।
उदाहरण
(i) [Ti(H₂O)₆]³⁺ रंगीन है।
(ii) Cu²⁺ के कई संकुल रंगीन होते हैं।
(iii) Zn²⁺ का d¹⁰ विन्यास होने के कारण d-d संक्रमण नहीं होता।
21. चुंबकीय गुण (Magnetic Properties)
परिभाषा
संकुल में उपस्थित अयुग्मित इलेक्ट्रॉनों की संख्या उसके चुंबकीय व्यवहार को निर्धारित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
चुंबकीय आघूर्ण
μ = √n(n + 2) BM
जहाँ—
μ = चुंबकीय आघूर्ण
n = अयुग्मित इलेक्ट्रॉनों की संख्या
मुख्य बिंदु
– अयुग्मित इलेक्ट्रॉन → अनुचुंबकीय।
– सभी इलेक्ट्रॉन युग्मित → प्रतिचुंबकीय।
– अयुग्मित इलेक्ट्रॉन अधिक होने पर सामान्यतः चुंबकीय आघूर्ण अधिक होता है।
चार संख्यात्मक प्रश्न
प्रश्न 1: किसी संकुल में 2 अयुग्मित इलेक्ट्रॉन हैं। μ ज्ञात कीजिए।
μ = √2(2 + 2)
μ = √8
μ ≈ 2.83 BM
प्रश्न 2: 3 अयुग्मित इलेक्ट्रॉन के लिए μ ज्ञात कीजिए।
μ = √3(3 + 2)
μ = √15
μ ≈ 3.87 BM
प्रश्न 3: 4 अयुग्मित इलेक्ट्रॉन हैं।
μ = √4(4 + 2)
μ = √24
μ ≈ 4.90 BM
प्रश्न 4: सभी इलेक्ट्रॉन युग्मित हैं।
n = 0
μ = 0
उत्तर: 0 BM
22. उपसहसंयोजन यौगिकों का धातुओं के निष्कर्षण में महत्व (Role in Extraction of Metals)
परिभाषा
कुछ धातुओं को उनके अयस्कों से अलग करने में उपसहसंयोजन यौगिकों का निर्माण उपयोगी होता है।
मुख्य बिंदु
– धातु और उपयुक्त लिगैंड के बीच संकुल बन सकता है।
– संकुल बनने से धातु को अन्य पदार्थों से अलग करने में सहायता मिल सकती है।
– सोने और चाँदी के निष्कर्षण में सायनाइड संकुल महत्वपूर्ण हैं।
उदाहरण
सोने के निष्कर्षण में—
4Au + 8CN⁻ + O₂ + 2H₂O → 4[Au(CN)₂]⁻ + 4OH⁻
यहाँ सोना घुलनशील सायनाइड संकुल के रूप में आ जाता है।
23. गुणात्मक विश्लेषण में महत्व (Role in Qualitative Analysis)
परिभाषा
किसी मिश्रण में उपस्थित आयनों की पहचान करने के लिए उपसहसंयोजन यौगिकों के बनने और उनके रंग/घुलनशीलता में परिवर्तन का उपयोग किया जाता है।
मुख्य बिंदु
– कुछ धातु आयन विशिष्ट लिगैंड के साथ रंगीन संकुल बनाते हैं।
– संकुल बनने से आयन की पहचान में सहायता मिलती है।
– NH₃, CN⁻ आदि लिगैंड विश्लेषण में उपयोगी हो सकते हैं।
उदाहरण
(i) Cu²⁺ + NH₃ → गहरा नीला संकुल
(ii) Ag⁺ + NH₃ → [Ag(NH₃)₂]⁺
(iii) कुछ धातु आयनों की पहचान रंगीन संकुल द्वारा की जाती है।
24. जैविक निकायों में उपसहसंयोजन यौगिक (Coordination Compounds in Biological Systems)
उपसहसंयोजन यौगिक केवल प्रयोगशाला तक सीमित नहीं हैं। जीवित शरीर में भी कई महत्वपूर्ण पदार्थ उपसहसंयोजन संरचना रखते हैं।
हीमोग्लोबिन
हीमोग्लोबिन में Fe युक्त उपसहसंयोजक व्यवस्था ऑक्सीजन के परिवहन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
क्लोरोफिल
क्लोरोफिल में Mg केंद्रीय धातु के रूप में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है और प्रकाश संश्लेषण से जुड़ा है।
विटामिन B₁₂
विटामिन B₁₂ में Co धातु उपस्थित होती है।
तीन आसान उदाहरण
(i) हीमोग्लोबिन → Fe
(ii) क्लोरोफिल → Mg
(iii) विटामिन B₁₂ → Co
25. अध्याय का क्विक रिवीजन
★ उपसहसंयोजन यौगिक में केंद्रीय धातु और लिगैंड मुख्य भाग होते हैं।
★ लिगैंड इलेक्ट्रॉन-युग्म देता है।
★ केंद्रीय धातु इलेक्ट्रॉन-युग्म स्वीकार करती है।
★ उपसहसंयोजन संख्या = सीधे जुड़े दाता परमाणुओं की संख्या।
★ NH₃, H₂O और Cl⁻ सामान्य लिगैंड हैं।
★ NO₂⁻ और SCN⁻ उभयदंती लिगैंड हो सकते हैं।
★ वर्नर ने प्राथमिक और द्वितीयक संयोजकता का विचार दिया।
★ VBT संकरण और आकृति समझाने में उपयोगी है।
★ CFT d-कक्षकों के ऊर्जा-विभाजन को समझाता है।
★ d-d संक्रमण संकुल के रंग से जुड़ा हो सकता है।
★ अयुग्मित इलेक्ट्रॉन संकुल के चुंबकीय गुण को प्रभावित करते हैं।
★ cis-trans ज्यामितीय समावयवता के उदाहरण हैं।
★ NO₂⁻ से linkage isomerism हो सकता है।
★ उपसहसंयोजन यौगिक धातु निष्कर्षण और गुणात्मक विश्लेषण में उपयोगी हैं।
★ हीमोग्लोबिन, क्लोरोफिल और विटामिन B₁₂ जैविक महत्व के प्रमुख उदाहरण हैं।
26. पूरे अध्याय के जरूरी सूत्र और संबंध
1. उपसहसंयोजन संख्या
C.N. = सीधे जुड़े दाता परमाणुओं की संख्या
2. ऑक्सीकरण अवस्था
सभी ऑक्सीकरण संख्याओं का योग = संकुल का कुल आवेश
3. चुंबकीय आघूर्ण
μ = √n(n + 2) BM
4. अष्टफलकीय विभाजन
Δ₀
5. चतुष्फलकीय विभाजन
Δₜ ≈ 4/9 Δ₀
6. चतुष्फलकीय क्षेत्र में ऊर्जा व्यवस्था
e < t₂
7. अष्टफलकीय क्षेत्र में ऊर्जा व्यवस्था
t₂g < eᵍ
—
चार मिश्रित अभ्यास प्रश्न
प्रश्न 1
[Fe(CN)₆]⁴⁻ में Fe की ऑक्सीकरण अवस्था और उपसहसंयोजन संख्या ज्ञात कीजिए।
x − 6 = −4
Fe = +2
6 CN⁻ सीधे जुड़े हैं।
उपसहसंयोजन संख्या = 6
प्रश्न 2
[Co(NH₃)₆]³⁺ में Co की ऑक्सीकरण अवस्था और उपसहसंयोजन संख्या बताइए।
NH₃ का आवेश = 0
Co = +3
छह NH₃ जुड़े हैं।
C.N. = 6
प्रश्न 3
[PtCl₄]²⁻ में Pt की ऑक्सीकरण अवस्था ज्ञात कीजिए।
x + 4(−1) = −2
x = +2
Pt = +2
प्रश्न 4
किसी संकुल में 5 अयुग्मित इलेक्ट्रॉन हैं। उसका चुंबकीय आघूर्ण ज्ञात कीजिए।
μ = √5(5 + 2)
μ = √35
μ ≈ 5.92 BM
27. पूरे अध्याय से पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न
1.
उपसहसंयोजन यौगिक की परिभाषा दीजिए तथा एक उदाहरण लिखिए।
2.
लिगैंड क्या है? एकदंती और द्विदंती लिगैंड में अंतर बताइए।
3.
उपसहसंयोजन संख्या क्या है? [Co(NH₃)₆]³⁺ की उपसहसंयोजन संख्या बताइए।
4.
वर्नर के सिद्धांत की मुख्य बातें लिखिए।
5.
प्राथमिक और द्वितीयक संयोजकता में अंतर लिखिए।
6.
[Fe(CN)₆]⁴⁻ में Fe की ऑक्सीकरण अवस्था ज्ञात कीजिए।
7.
उपसहसंयोजन यौगिकों के नामकरण के मुख्य नियम लिखिए।
8.
लिंकेज समावयवता क्या है? उदाहरण दीजिए।
9.
ज्यामितीय समावयवता क्या है? cis और trans को समझाइए।
10.
प्रकाशीय समावयवता क्या है?
11.
VBT के आधार पर उपसहसंयोजन यौगिकों में बंधन को समझाइए।
12.
CFT क्या है?
13.
अष्टफलकीय संकुल में d-कक्षकों का विभाजन समझाइए।
14.
उपसहसंयोजन यौगिक रंगीन क्यों होते हैं?
15.
उपसहसंयोजन यौगिकों के चुंबकीय गुणों को समझाइए।
16.
उपसहसंयोजन यौगिकों का धातु निष्कर्षण में क्या महत्व है?
17.
गुणात्मक विश्लेषण में उपसहसंयोजन यौगिकों की उपयोगिता बताइए।
18.
हीमोग्लोबिन और क्लोरोफिल में उपसहसंयोजन यौगिकों का महत्व बताइए।
28. इस अध्याय में होने वाली सामान्य गलतियाँ
गलती 1
लिगैंडों की संख्या और उपसहसंयोजन संख्या को हमेशा समान मान लेना।
सही बात: बहुदंती लिगैंड होने पर दाता परमाणु गिनने पड़ते हैं।
गलती 2
संकुल का कुल आवेश और केंद्रीय धातु की ऑक्सीकरण अवस्था को एक ही समझ लेना।
सही बात: पहले सभी लिगैंडों के आवेश लगाकर धातु की अवस्था निकालें।
गलती 3
[ ] के बाहर के आयनों को उपसहसंयोजन संख्या में गिनना।
सही बात: केवल केंद्रीय धातु से सीधे जुड़े दाता परमाणु गिने जाते हैं।
गलती 4
NO₂⁻ को हमेशा एक ही प्रकार से जुड़ा हुआ मानना।
सही बात: यह अलग-अलग दाता परमाणुओं से जुड़ सकता है, इसलिए linkage isomerism संभव है।
गलती 5
cis और trans को केवल नाम याद करके लिखना।
सही तरीका: पहले लिगैंडों की स्थानिक स्थिति देखिए।
गलती 6
μ = √n(n+2) में n को कुल इलेक्ट्रॉन समझ लेना।
सही: n = अयुग्मित इलेक्ट्रॉनों की संख्या।
गलती 7
Δ₀ और Δₜ को उलट देना।
याद रखें:
Δₜ ≈ 4/9 Δ₀
गलती 8
VBT और CFT को एक ही सिद्धांत मान लेना।
सही: VBT मुख्यतः संकरण/बंधन और आकृति की व्याख्या करता है, जबकि CFT d-कक्षकों के ऊर्जा-विभाजन और उससे जुड़े गुणों को समझाने में उपयोगी है।
29. याद रखने योग्य महत्वपूर्ण तथ्य
1. NH₃ = एकदंती लिगैंड
2. H₂O = एकदंती लिगैंड
3. Cl⁻ = एकदंती लिगैंड
4. en = द्विदंती लिगैंड
5. C₂O₄²⁻ = द्विदंती लिगैंड
6. NO₂⁻ = उभयदंती लिगैंड
7. SCN⁻ = उभयदंती लिगैंड
8. [Ag(NH₃)₂]⁺ = उपसहसंयोजन संख्या 2
9. [Co(NH₃)₆]³⁺ = उपसहसंयोजन संख्या 6
10. [PtCl₄]²⁻ = उपसहसंयोजन संख्या 4
11. dsp² → वर्ग समतलीय
12. sp³ → चतुष्फलकीय
13. d²sp³ → अष्टफलकीय
14. sp³d² → अष्टफलकीय
15. अयुग्मित इलेक्ट्रॉन → अनुचुंबकीय
16. सभी इलेक्ट्रॉन युग्मित → प्रतिचुंबकीय
17. μ = √n(n+2) BM
18. Δₜ ≈ 4/9 Δ₀
19. हीमोग्लोबिन → Fe
20. क्लोरोफिल → Mg
21. विटामिन B₁₂ → Co
30. परीक्षा से पहले अंतिम जाँच
अपने आप से बिना नोट्स देखे इनका उत्तर दो—
1. लिगैंड किसे कहते हैं?
2. दाता परमाणु क्या है?
3. C.N. कैसे निकालते हैं?
4. [Fe(CN)₆]³⁻ में Fe की अवस्था क्या होगी?
5. Werner theory में प्राथमिक और द्वितीयक संयोजकता क्या है?
6. NO₂⁻ linkage isomerism कैसे देता है?
7. cis और trans में क्या अंतर है?
8. VBT में dsp² किस आकृति से जुड़ा है?
9. CFT में d-कक्षकों का विभाजन क्यों होता है?
10. 4 अयुग्मित इलेक्ट्रॉन के लिए μ कितना होगा?
अध्याय की सबसे जरूरी तस्वीर दिमाग में ऐसे बनाओ
केंद्रीय धातु
↓
लिगैंड
↓
दाता परमाणु
↓
उपसहसंयोजन संख्या
↓
संकुल की आकृति
↓
VBT / CFT
↓
रंग + चुंबकीय गुण
↓
समावयवता
↓
धातु निष्कर्षण + गुणात्मक विश्लेषण + जैविक महत्व
यही क्रम Chapter 5 को अलग-अलग याद करने के बजाय एक जुड़ी हुई कहानी की तरह समझने में मदद करेगा।