अध्याय 14 — अर्द्धचालक इलेक्ट्रॉनिकी (पदार्थ, युक्तियाँ तथा सरल परिपथ — Semiconductor Electronics)

★ अध्याय की महत्वपूर्ण परिभाषाएँ

★ 1. अर्द्धचालक (Semiconductor)

वे पदार्थ जिनकी विद्युत चालकता चालक और कुचालक के बीच होती है तथा जिनकी चालकता तापमान और अशुद्धि मिलाने से काफी बदल सकती है, अर्द्धचालक कहलाते हैं।

★ 2. संयोजक बैंड (Valence Band)

ठोस पदार्थ में वह ऊर्जा-बैंड जिसमें परमाणु के संयोजक इलेक्ट्रॉन सामान्य अवस्था में उपस्थित रहते हैं, संयोजक बैंड कहलाता है।

★ 3. चालन बैंड (Conduction Band)

वह ऊर्जा-बैंड जिसमें पहुँचने पर इलेक्ट्रॉन पदार्थ में अपेक्षाकृत स्वतंत्र रूप से गति करके विद्युत धारा के प्रवाह में योगदान कर सकते हैं, चालन बैंड कहलाता है।

★ 4. ऊर्जा अंतराल (Energy Gap)

संयोजक बैंड के ऊपरी सिरे और चालन बैंड के निचले सिरे के बीच के ऊर्जा अंतर को ऊर्जा अंतराल कहते हैं।

★ 5. शुद्ध अर्द्धचालक (Intrinsic Semiconductor)

ऐसा अर्द्धचालक जिसमें कोई जानबूझकर अशुद्धि नहीं मिलाई जाती और जिसमें इलेक्ट्रॉन तथा विवर की संख्या बराबर होती है, शुद्ध अर्द्धचालक कहलाता है।

★ 6. अशुद्ध अर्द्धचालक (Extrinsic Semiconductor)

शुद्ध अर्द्धचालक में नियंत्रित मात्रा में उपयुक्त अशुद्धि मिलाकर उसकी चालकता बढ़ाई जाती है। इस प्रकार प्राप्त अर्द्धचालक को अशुद्ध अर्द्धचालक कहते हैं।

★ 7. डोपिंग (Doping)

शुद्ध अर्द्धचालक में बहुत थोड़ी मात्रा में उपयुक्त अशुद्धि मिलाकर उसकी विद्युत चालकता को नियंत्रित करने की प्रक्रिया को डोपिंग कहते हैं।

★ 8. दाता अशुद्धि (Donor Impurity)

पंचसंयोजी अशुद्धि, जो अर्द्धचालक को अतिरिक्त मुक्त इलेक्ट्रॉन प्रदान करती है, दाता अशुद्धि कहलाती है।

★ 9. ग्राही अशुद्धि (Acceptor Impurity)

त्रिसंयोजी अशुद्धि, जो अर्द्धचालक में इलेक्ट्रॉन की कमी उत्पन्न करके विवर प्रदान करती है, ग्राही अशुद्धि कहलाती है।

★ 10. n-प्रकार अर्द्धचालक (n-type Semiconductor)

जब शुद्ध अर्द्धचालक में पंचसंयोजी अशुद्धि मिलाई जाती है और इलेक्ट्रॉन बहुसंख्यक आवेश वाहक बन जाते हैं, तो प्राप्त अर्द्धचालक n-प्रकार कहलाता है।

★ 11. p-प्रकार अर्द्धचालक (p-type Semiconductor)

जब शुद्ध अर्द्धचालक में त्रिसंयोजी अशुद्धि मिलाई जाती है और विवर बहुसंख्यक आवेश वाहक बन जाते हैं, तो प्राप्त अर्द्धचालक p-प्रकार कहलाता है।

★ 12. विवर (Hole)

संयोजक बैंड में इलेक्ट्रॉन की अनुपस्थिति को एक धनात्मक आवेश वाहक की तरह माना जाता है, जिसे विवर कहते हैं।

★ 13. बहुसंख्यक आवेश वाहक (Majority Charge Carriers)

अर्द्धचालक में जिन आवेश वाहकों की संख्या अधिक होती है, उन्हें बहुसंख्यक आवेश वाहक कहते हैं।

★ 14. अल्पसंख्यक आवेश वाहक (Minority Charge Carriers)

अर्द्धचालक में जिन आवेश वाहकों की संख्या कम होती है, उन्हें अल्पसंख्यक आवेश वाहक कहते हैं।

★ 15. p-n संधि (p-n Junction)

p-प्रकार और n-प्रकार अर्द्धचालकों को एक ही क्रिस्टल में जोड़ने पर बनने वाली सीमा को p-n संधि कहते हैं।

★ 16. रिक्तीकरण क्षेत्र (Depletion Region)

p-n संधि के आसपास का वह क्षेत्र जिसमें गतिशील आवेश वाहकों की संख्या बहुत कम हो जाती है और स्थिर आयनों के कारण आंतरिक विद्युत क्षेत्र बनता है, रिक्तीकरण क्षेत्र कहलाता है।

★ 17. विभव प्राचीर (Potential Barrier)

p-n संधि के रिक्तीकरण क्षेत्र में उत्पन्न वह विभव अंतर जो बहुसंख्यक आवेश वाहकों के आगे प्रसार का विरोध करता है, विभव प्राचीर कहलाता है।

★ 18. अग्र अभिनति (Forward Bias)

जब p-n संधि के p-पक्ष को बैटरी के धनात्मक और n-पक्ष को ऋणात्मक टर्मिनल से जोड़ा जाता है, तो इसे अग्र अभिनति कहते हैं।

★ 19. उत्क्रम अभिनति (Reverse Bias)

जब p-n संधि के p-पक्ष को बैटरी के ऋणात्मक और n-पक्ष को धनात्मक टर्मिनल से जोड़ा जाता है, तो इसे उत्क्रम अभिनति कहते हैं।

★ 20. अर्द्धचालक डायोड (Semiconductor Diode)

एक p-n संधि युक्ति जो मुख्यतः विद्युत धारा को एक दिशा में आसानी से प्रवाहित होने देती है, अर्द्धचालक डायोड कहलाती है।

★ 21. घुटना वोल्टता (Knee Voltage)

अग्र अभिनति में वह न्यूनतम वोल्टता जिसके बाद डायोड की धारा तेजी से बढ़ने लगती है, घुटना वोल्टता कहलाती है।

★ 22. भंजन वोल्टता (Breakdown Voltage)

उत्क्रम अभिनति में वह वोल्टता जिस पर उत्क्रम धारा अचानक बहुत तेजी से बढ़ जाती है, भंजन वोल्टता कहलाती है।

★ 23. जेनर डायोड (Zener Diode)

ऐसा विशेष रूप से अधिक डोपित p-n जंक्शन डायोड जो उत्क्रम भंजन क्षेत्र में भी सुरक्षित रूप से कार्य कर सकता है, जेनर डायोड कहलाता है।

★ 24. दिष्टकारी (Rectifier)

वह परिपथ जो प्रत्यावर्ती धारा (AC) को एकदिशीय स्पंदित धारा (Pulsating DC) में बदलता है, दिष्टकारी कहलाता है।

★ 25. ट्रांजिस्टर (Transistor)

तीन अर्द्धचालक क्षेत्रों से बनी ऐसी अर्द्धचालक युक्ति जिसमें दो p-n संधियाँ होती हैं और जिसका उपयोग प्रवर्धन तथा स्विचिंग में किया जाता है, ट्रांजिस्टर कहलाता है।

★ 26. उत्सर्जक (Emitter)

ट्रांजिस्टर का वह भाग जो बहुसंख्यक आवेश वाहकों को आधार की ओर भेजता है, उत्सर्जक कहलाता है।

★ 27. आधार (Base)

ट्रांजिस्टर का बीच का बहुत पतला और हल्का डोपित क्षेत्र, जो उत्सर्जक तथा संग्राहक के बीच स्थित होता है, आधार कहलाता है।

★ 28. संग्राहक (Collector)

ट्रांजिस्टर का वह भाग जो आधार से होकर आने वाले अधिकांश आवेश वाहकों को एकत्र करता है, संग्राहक कहलाता है।

★ 29. धारा प्रवर्धन (Current Gain)

ट्रांजिस्टर में संग्राहक धारा और आधार धारा के अनुपात को धारा प्रवर्धन कहते हैं।

★ 30. तर्क द्वार (Logic Gate)

ऐसी इलेक्ट्रॉनिक युक्ति जो एक या अधिक इनपुट के आधार पर निश्चित तर्क नियम के अनुसार एक आउटपुट देती है, तर्क द्वार कहलाती है।

★ 31. AND द्वार

वह तर्क द्वार जिसका आउटपुट तभी 1 होता है जब उसके सभी इनपुट 1 हों, AND द्वार कहलाता है।

★ 32. OR द्वार

वह तर्क द्वार जिसका आउटपुट तब 1 होता है जब कम-से-कम एक इनपुट 1 हो, OR द्वार कहलाता है।

★ 33. NOT द्वार

वह तर्क द्वार जिसका आउटपुट इनपुट का उल्टा होता है, NOT द्वार कहलाता है।

★ 34. NAND द्वार

AND द्वार के आउटपुट का उल्टा करने पर प्राप्त तर्क द्वार को NAND द्वार कहते हैं।

★ 35. NOR द्वार

OR द्वार के आउटपुट का उल्टा करने पर प्राप्त तर्क द्वार को NOR द्वार कहते हैं।

★ 1. अर्द्धचालक पदार्थ (Semiconductor Materials)

★ परिभाषा

अर्द्धचालक वे पदार्थ हैं जिनकी विद्युत चालकता चालक और कुचालक के बीच होती है। इनकी चालकता तापमान बढ़ाने तथा उपयुक्त अशुद्धि मिलाने पर काफी बढ़ाई जा सकती है।

★ प्रमुख उदाहरण

सिलिकॉन (Si) और जर्मेनियम (Ge)

★ मुख्य बिंदु

★ अर्द्धचालक की चालकता तापमान बढ़ने पर बढ़ती है।

★ सामान्य तापमान पर कुछ इलेक्ट्रॉन बंधन से मुक्त होकर चालन में भाग ले सकते हैं।

★ शुद्ध अर्द्धचालक में इलेक्ट्रॉन और विवर दोनों धारा के वाहक होते हैं।

★ विशेषता

धातुओं के विपरीत अर्द्धचालक का प्रतिरोध तापमान बढ़ने पर सामान्यतः घटता है।

★ उदाहरण

i. सिलिकॉन का उपयोग डायोड और ट्रांजिस्टर बनाने में होता है।

ii. जर्मेनियम भी एक अर्द्धचालक पदार्थ है।

iii. इलेक्ट्रॉनिक परिपथों में अर्द्धचालक पदार्थ बहुत महत्वपूर्ण हैं।

★ 2. ऊर्जा बैंड (Energy Bands)

★ परिभाषा

ठोस पदार्थ में बहुत-से परमाणुओं के ऊर्जा स्तर पास-पास आकर ऊर्जा के विस्तृत क्षेत्रों का निर्माण करते हैं। इन्हें ऊर्जा बैंड कहते हैं।

मुख्यतः संयोजक बैंड और चालन बैंड का अध्ययन किया जाता है।

★ मुख्य बिंदु

★ चालक में संयोजक और चालन बैंड एक-दूसरे को छू सकते हैं या उनमें अंतर बहुत कम होता है।

★ अर्द्धचालक में ऊर्जा अंतराल छोटा होता है।

★ कुचालक में ऊर्जा अंतराल अपेक्षाकृत बड़ा होता है।

★ विशेषता

अर्द्धचालक की विद्युत चालकता उसके ऊर्जा अंतराल से भी प्रभावित होती है।

★ उदाहरण

i. सिलिकॉन में छोटा ऊर्जा अंतराल होता है।

ii. कुचालक में इलेक्ट्रॉन को चालन बैंड तक पहुँचाने के लिए अधिक ऊर्जा चाहिए।

iii. तापीय ऊर्जा से कुछ इलेक्ट्रॉन चालन बैंड में पहुँच सकते हैं।

★ 3. शुद्ध अर्द्धचालक (Intrinsic Semiconductor)

★ परिभाषा

ऐसा अर्द्धचालक जिसमें जानबूझकर कोई अशुद्धि नहीं मिलाई गई हो और जिसमें मुक्त इलेक्ट्रॉनों तथा विवरों की संख्या बराबर हो, शुद्ध अर्द्धचालक कहलाता है।

★ सूत्र

शुद्ध अर्द्धचालक के लिए—

nₑ = nₕ = nᵢ

जहाँ,

nₑ = इलेक्ट्रॉन की सांद्रता
nₕ = विवर की सांद्रता
nᵢ = शुद्ध अर्द्धचालक की वाहक सांद्रता

★ मुख्य बिंदु

★ इलेक्ट्रॉन और विवर दोनों धारा के वाहक हैं।

★ दोनों की संख्या बराबर होती है।

★ तापमान बढ़ाने पर वाहक संख्या बढ़ती है।

★ उदाहरण

i. शुद्ध सिलिकॉन।

ii. शुद्ध जर्मेनियम।

iii. ताप बढ़ाने पर शुद्ध अर्द्धचालक की चालकता बढ़ना।

★ 4. डोपिंग और अशुद्ध अर्द्धचालक (Doping and Extrinsic Semiconductor)

★ परिभाषा

शुद्ध अर्द्धचालक की चालकता को नियंत्रित करने के लिए उसमें बहुत कम मात्रा में उपयुक्त अशुद्धि मिलाने की प्रक्रिया डोपिंग कहलाती है।

डोपिंग से प्राप्त अर्द्धचालक को अशुद्ध अर्द्धचालक कहते हैं।

★ मुख्य बिंदु

★ पंचसंयोजी अशुद्धि से n-प्रकार बनता है।

★ त्रिसंयोजी अशुद्धि से p-प्रकार बनता है।

★ अशुद्धि की मात्रा बहुत कम रखी जाती है।

★ उदाहरण

i. सिलिकॉन में फॉस्फोरस मिलाने पर n-प्रकार बनता है।

ii. सिलिकॉन में बोरॉन मिलाने पर p-प्रकार बनता है।

iii. जर्मेनियम में उपयुक्त अशुद्धि मिलाकर उसकी चालकता बदली जा सकती है।

★ 5. n-प्रकार अर्द्धचालक (n-type Semiconductor)

★ परिभाषा

शुद्ध सिलिकॉन या जर्मेनियम में पंचसंयोजी अशुद्धि मिलाने पर चार संयोजक इलेक्ट्रॉन बंधन बनाते हैं और पाँचवाँ इलेक्ट्रॉन अपेक्षाकृत आसानी से मुक्त हो जाता है। इस प्रकार बनने वाला अर्द्धचालक n-प्रकार कहलाता है।

★ मुख्य बिंदु

★ इलेक्ट्रॉन बहुसंख्यक वाहक हैं।

★ विवर अल्पसंख्यक वाहक हैं।

★ पंचसंयोजी अशुद्धि को दाता अशुद्धि कहते हैं।

★ उदाहरण

i. सिलिकॉन + फॉस्फोरस

ii. सिलिकॉन + आर्सेनिक

iii. जर्मेनियम + एंटीमनी

★ 6. p-प्रकार अर्द्धचालक (p-type Semiconductor)

★ परिभाषा

शुद्ध सिलिकॉन या जर्मेनियम में त्रिसंयोजी अशुद्धि मिलाने पर एक बंधन में इलेक्ट्रॉन की कमी रह जाती है। यह कमी विवर के रूप में व्यवहार करती है। इस प्रकार बनने वाला अर्द्धचालक p-प्रकार कहलाता है।

★ मुख्य बिंदु

★ विवर बहुसंख्यक वाहक हैं।

★ इलेक्ट्रॉन अल्पसंख्यक वाहक हैं।

★ त्रिसंयोजी अशुद्धि को ग्राही अशुद्धि कहते हैं।

★ उदाहरण

i. सिलिकॉन + बोरॉन।

ii. सिलिकॉन + एल्युमिनियम।

iii. जर्मेनियम + गैलियम।

★ 7. p-n संधि (p-n Junction)

★ परिभाषा

p-प्रकार और n-प्रकार अर्द्धचालकों को एक ही क्रिस्टल में जोड़ने पर उनके बीच बनने वाली सीमा को p-n संधि कहते हैं। इसके आसपास आवेश वाहकों के पुनर्संयोजन के कारण रिक्तीकरण क्षेत्र बन जाता है।

★ मुख्य बिंदु

★ p-पक्ष में विवर अधिक होते हैं।

★ n-पक्ष में इलेक्ट्रॉन अधिक होते हैं।

★ संधि के पास रिक्तीकरण क्षेत्र बनता है।

★ इसमें आंतरिक विद्युत क्षेत्र उत्पन्न होता है।

★ उदाहरण

i. साधारण अर्द्धचालक डायोड में p-n संधि होती है।

ii. LED एक p-n संधि युक्ति है।

iii. सौर सेल में भी p-n संधि का उपयोग होता है।

★ 8. रिक्तीकरण क्षेत्र और विभव प्राचीर (Depletion Region and Potential Barrier)

★ परिभाषा

p-n संधि बनने पर p-पक्ष के कुछ विवर n-पक्ष की ओर तथा n-पक्ष के कुछ इलेक्ट्रॉन p-पक्ष की ओर फैलकर पुनर्संयोजित होते हैं। संधि के आसपास गतिशील वाहकों की कमी वाला क्षेत्र रिक्तीकरण क्षेत्र कहलाता है।

इस क्षेत्र के कारण उत्पन्न विभव अंतर को विभव प्राचीर कहते हैं।

★ मुख्य बिंदु

★ रिक्तीकरण क्षेत्र में स्थिर आयन उपस्थित रहते हैं।

★ यह क्षेत्र आवेश वाहकों के आगे प्रसार का विरोध करता है।

★ इसके कारण संधि के पार विभव अंतर बनता है।

★ विशेषता

सिलिकॉन के लिए विभव प्राचीर का सामान्य मान लगभग 0.7 V और जर्मेनियम के लिए लगभग 0.3 V माना जाता है।

★ उदाहरण

i. p-n संधि में रिक्तीकरण क्षेत्र बनना।

ii. डायोड में अग्र धारा के लिए प्राचीर पार करना।

iii. उत्क्रम अभिनति में रिक्तीकरण क्षेत्र का चौड़ा होना।

★ 9. p-n संधि की अग्र अभिनति (Forward Bias)

★ परिभाषा

जब p-पक्ष को बैटरी के धनात्मक टर्मिनल तथा n-पक्ष को ऋणात्मक टर्मिनल से जोड़ा जाता है, तो p-n संधि अग्र अभिनति में होती है।

★ मुख्य बिंदु

★ विभव प्राचीर घटती है।

★ रिक्तीकरण क्षेत्र पतला होता है।

★ बहुसंख्यक वाहकों का संधि पार करना आसान होता है।

★ डायोड में धारा तेजी से बढ़ सकती है।

★ उदाहरण

i. डायोड को अग्र अभिनति में जोड़कर धारा प्रवाहित करना।

ii. दिष्टकारी परिपथ में डायोड का अग्र अभिनति में काम करना।

iii. LED को उपयुक्त अग्र अभिनति देना।

★ 10. p-n संधि की उत्क्रम अभिनति (Reverse Bias)

★ परिभाषा

जब p-पक्ष को बैटरी के ऋणात्मक तथा n-पक्ष को धनात्मक टर्मिनल से जोड़ा जाता है, तो p-n संधि उत्क्रम अभिनति में होती है।

★ मुख्य बिंदु

★ रिक्तीकरण क्षेत्र चौड़ा होता है।

★ विभव प्राचीर बढ़ती है।

★ बहुसंख्यक वाहकों की धारा लगभग रुक जाती है।

★ अल्पसंख्यक वाहकों के कारण बहुत छोटी उत्क्रम धारा बहती है।

★ उदाहरण

i. डायोड को उत्क्रम अभिनति में जोड़ना।

ii. जेनर डायोड का उत्क्रम क्षेत्र में कार्य करना।

iii. भंजन क्षेत्र में डायोड की उत्क्रम धारा बढ़ना।

★ 11. अर्द्धचालक डायोड की V-I विशेषता (V-I Characteristics)

★ परिभाषा

डायोड के सिरों के बीच लगाए गए वोल्टेज और उसमें बहने वाली धारा के बीच संबंध को V-I विशेषता कहते हैं।

★ मुख्य बिंदु

★ अग्र अभिनति में शुरू में धारा बहुत कम रहती है।

★ घुटना वोल्टता के बाद धारा तेजी से बढ़ती है।

★ उत्क्रम अभिनति में धारा बहुत कम रहती है।

★ भंजन वोल्टता के बाद उत्क्रम धारा तेजी से बढ़ती है।

★ उदाहरण

i. सिलिकॉन डायोड की V-I विशेषता।

ii. जर्मेनियम डायोड की V-I विशेषता।

iii. जेनर डायोड की उत्क्रम विशेषता।

★ 12. दिष्टकारी (Rectifier)

★ परिभाषा

ऐसा इलेक्ट्रॉनिक परिपथ जो AC वोल्टेज या धारा को एकदिशीय स्पंदित धारा में बदलता है, दिष्टकारी कहलाता है।

मुख्य प्रकार—

★ अर्ध-तरंग दिष्टकारी (Half Wave Rectifier)

★ पूर्ण-तरंग दिष्टकारी (Full Wave Rectifier)

★ मुख्य बिंदु

★ डायोड की एकदिशीय चालकता का उपयोग किया जाता है।

★ आउटपुट पूर्णतः स्थिर DC नहीं बल्कि स्पंदित DC होता है।

★ उदाहरण

i. AC को DC में बदलने वाला बिजली का एडाप्टर।

ii. इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों की विद्युत आपूर्ति।

iii. चार्जर के विद्युत आपूर्ति भाग में दिष्टकारी।

★ 13. अर्ध-तरंग दिष्टकारी (Half Wave Rectifier)

★ परिभाषा

वह दिष्टकारी परिपथ जिसमें AC के केवल एक अर्धचक्र का उपयोग करके आउटपुट प्राप्त किया जाता है, अर्ध-तरंग दिष्टकारी कहलाता है।

★ मुख्य बिंदु

★ एक अर्धचक्र में डायोड चालक होता है।

★ दूसरे अर्धचक्र में डायोड धारा को रोकता है।

★ इसका आउटपुट स्पंदित DC होता है।

★ उदाहरण

i. सरल डायोड आधारित दिष्टकारी।

ii. कम शक्ति के सरल परिपथ।

iii. मूलभूत दिष्टकारी प्रयोग।

★ 14. पूर्ण-तरंग दिष्टकारी (Full Wave Rectifier)

★ परिभाषा

वह दिष्टकारी परिपथ जिसमें AC के दोनों अर्धचक्रों का उपयोग करके एक ही दिशा में आउटपुट धारा प्राप्त की जाती है, पूर्ण-तरंग दिष्टकारी कहलाता है।

★ मुख्य बिंदु

★ दोनों अर्धचक्र उपयोगी होते हैं।

★ आउटपुट अधिक सुचारु होता है।

★ इसकी दक्षता अर्ध-तरंग दिष्टकारी से अधिक होती है।

★ उदाहरण

i. केंद्र-टैप पूर्ण-तरंग दिष्टकारी।

ii. ब्रिज दिष्टकारी।

iii. DC विद्युत आपूर्ति परिपथ।

★ 15. जेनर डायोड (Zener Diode)

★ परिभाषा

जेनर डायोड एक विशेष प्रकार का अधिक डोपित p-n संधि डायोड है जिसे उत्क्रम भंजन क्षेत्र में कार्य करने के लिए बनाया जाता है। इसका उपयोग मुख्यतः वोल्टेज को लगभग स्थिर रखने में किया जाता है।

★ मुख्य बिंदु

★ यह उत्क्रम अभिनति में कार्य करता है।

★ भंजन क्षेत्र में इसका वोल्टेज लगभग स्थिर रहता है।

★ इसका उपयोग वोल्टेज नियमन में किया जाता है।

★ उदाहरण

i. DC विद्युत आपूर्ति में वोल्टेज नियमन।

ii. संवेदनशील इलेक्ट्रॉनिक परिपथ की सुरक्षा।

iii. स्थिर संदर्भ वोल्टेज प्राप्त करना।

★ संख्यात्मक प्रश्न 1

जेनर डायोड का वोल्टेज 6 V है और धारा 20 mA है। शक्ति ज्ञात कीजिए।

P = VI

= 6 × 20 × 10⁻³

= 0.12 W

उत्तर: 0.12 W

★ संख्यात्मक प्रश्न 2

जेनर वोल्टेज 10 V तथा धारा 30 mA है। शक्ति ज्ञात कीजिए।

P = 10 × 30 × 10⁻³

= 0.30 W

उत्तर: 0.30 W

★ संख्यात्मक प्रश्न 3

जेनर डायोड की शक्ति 0.5 W और वोल्टेज 5 V है। अधिकतम धारा ज्ञात कीजिए।

I = P/V

= 0.5/5

= 0.1 A

= 100 mA

उत्तर: 100 mA

★ संख्यात्मक प्रश्न 4

जेनर डायोड की शक्ति 1.2 W और धारा 0.2 A है। वोल्टेज ज्ञात कीजिए।

V = P/I

= 1.2/0.2

= 6 V

उत्तर: 6 V

★ 16. ट्रांजिस्टर (Transistor)

★ परिभाषा

ट्रांजिस्टर तीन अर्द्धचालक क्षेत्रों से बनी ऐसी इलेक्ट्रॉनिक युक्ति है जिसमें दो p-n संधियाँ होती हैं। इसका उपयोग मुख्यतः विद्युत संकेतों के प्रवर्धन तथा इलेक्ट्रॉनिक स्विच के रूप में किया जाता है।

ट्रांजिस्टर के तीन भाग हैं—

उत्सर्जक (Emitter), आधार (Base), संग्राहक (Collector)

★ मुख्य बिंदु

★ आधार बहुत पतला होता है।

★ उत्सर्जक अधिक डोपित होता है।

★ संग्राहक सामान्यतः अपेक्षाकृत बड़ा बनाया जाता है।

★ ट्रांजिस्टर में दो p-n संधियाँ होती हैं।

★ उदाहरण

i. संकेत प्रवर्धक।

ii. इलेक्ट्रॉनिक स्विच।

iii. डिजिटल परिपथों में ट्रांजिस्टर का उपयोग।

★ 17. ट्रांजिस्टर की धाराएँ (Transistor Currents)

★ परिभाषा

ट्रांजिस्टर में उत्सर्जक धारा, आधार धारा और संग्राहक धारा क्रमशः Iₑ, Iᵦ और I𝚌 से दर्शाई जाती हैं। आवेश संरक्षण के अनुसार उत्सर्जक धारा दोनों अन्य धाराओं के योग के बराबर होती है।

★ सूत्र

Iₑ = I𝚌 + Iᵦ

★ मुख्य बिंदु

★ उत्सर्जक धारा सबसे बड़ी होती है।

★ आधार धारा बहुत छोटी होती है।

★ संग्राहक धारा आधार धारा से बहुत अधिक हो सकती है।

★ उदाहरण

i. Iₑ = I𝚌 + Iᵦ का प्रयोग ट्रांजिस्टर की धाराओं में।

ii. आधार धारा में छोटा परिवर्तन संग्राहक धारा में बड़ा परिवर्तन उत्पन्न कर सकता है।

iii. इसी गुण के कारण ट्रांजिस्टर प्रवर्धन में उपयोगी है।

★ संख्यात्मक प्रश्न 1

यदि I𝚌 = 4 mA और Iᵦ = 1 mA है, तो Iₑ ज्ञात कीजिए।

Iₑ = I𝚌 + Iᵦ

= 4 + 1

= 5 mA

उत्तर: 5 mA

★ संख्यात्मक प्रश्न 2

यदि Iₑ = 10 mA और I𝚌 = 9.5 mA है, तो Iᵦ ज्ञात कीजिए।

Iᵦ = Iₑ − I𝚌

= 10 − 9.5

= 0.5 mA

उत्तर: 0.5 mA

★ संख्यात्मक प्रश्न 3

यदि Iₑ = 8 mA और Iᵦ = 0.2 mA है, तो I𝚌 ज्ञात कीजिए।

I𝚌 = Iₑ − Iᵦ

= 8 − 0.2

= 7.8 mA

उत्तर: 7.8 mA

★ संख्यात्मक प्रश्न 4

यदि I𝚌 = 9 mA और Iᵦ = 0.1 mA है, तो Iₑ ज्ञात कीजिए।

Iₑ = 9 + 0.1

= 9.1 mA

उत्तर: 9.1 mA

★ 18. धारा प्रवर्धन गुणांक β (Current Gain)

★ परिभाषा

सामान्य उत्सर्जक विन्यास (Common Emitter) में संग्राहक धारा में परिवर्तन और आधार धारा में परिवर्तन के अनुपात को धारा प्रवर्धन गुणांक β कहते हैं।

★ सूत्र

β = ΔI𝚌 / ΔIᵦ

जहाँ,

ΔI𝚌 = संग्राहक धारा में परिवर्तन
ΔIᵦ = आधार धारा में परिवर्तन

★ संबंध

β = α/(1 − α)

★ मुख्य बिंदु

★ β का मान सामान्यतः 1 से बहुत अधिक हो सकता है।

★ छोटी आधार धारा में परिवर्तन संग्राहक धारा में बड़ा परिवर्तन उत्पन्न कर सकता है।

★ यही ट्रांजिस्टर के प्रवर्धन का आधार है।

★ उदाहरण

i. आधार धारा में 0.1 mA परिवर्तन से संग्राहक धारा में 10 mA परिवर्तन।

ii. छोटे विद्युत संकेत को बड़ा करना।

iii. ट्रांजिस्टर प्रवर्धक में धारा प्रवर्धन।

★ संख्यात्मक प्रश्न 1

यदि ΔI𝚌 = 5 mA और ΔIᵦ = 0.1 mA है, तो β ज्ञात कीजिए।

β = 5/0.1

= 50

उत्तर: β = 50

★ संख्यात्मक प्रश्न 2

यदि β = 100 और ΔIᵦ = 0.2 mA है, तो ΔI𝚌 ज्ञात कीजिए।

ΔI𝚌 = βΔIᵦ

= 100 × 0.2

= 20 mA

उत्तर: 20 mA

★ संख्यात्मक प्रश्न 3

यदि β = 50 और ΔI𝚌 = 10 mA है, तो ΔIᵦ ज्ञात कीजिए।

ΔIᵦ = ΔI𝚌/β

= 10/50

= 0.2 mA

उत्तर: 0.2 mA

★ संख्यात्मक प्रश्न 4

यदि α = 0.98 है, तो β ज्ञात कीजिए।

β = α/(1 − α)

= 0.98/0.02

= 49

उत्तर: β = 49

★ 19. धारा प्रवर्धन गुणांक α (Current Gain)

★ परिभाषा

सामान्य आधार विन्यास (Common Base) में संग्राहक धारा में परिवर्तन और उत्सर्जक धारा में परिवर्तन के अनुपात को धारा प्रवर्धन गुणांक α कहते हैं।

★ सूत्र

α = ΔI𝚌 / ΔIₑ

तथा,

β = α/(1 − α)

★ मुख्य बिंदु

★ α का मान सामान्यतः 1 से थोड़ा कम होता है।

★ β और α एक-दूसरे से संबंधित हैं।

★ ट्रांजिस्टर के विन्यास के अनुसार धारा प्रवर्धन अलग-अलग रूप में लिखा जाता है।

★ उदाहरण

i. Common Base विन्यास में α का प्रयोग।

ii. Common Emitter विन्यास में β का प्रयोग।

iii. α और β से ट्रांजिस्टर की धारा संबंध समझना।

★ संख्यात्मक प्रश्न 1

यदि ΔI𝚌 = 9.8 mA और ΔIₑ = 10 mA है, तो α ज्ञात कीजिए।

α = 9.8/10

= 0.98

उत्तर: 0.98

★ संख्यात्मक प्रश्न 2

यदि α = 0.9 है, तो β ज्ञात कीजिए।

β = 0.9/(1 − 0.9)

= 0.9/0.1

= 9

उत्तर: 9

★ संख्यात्मक प्रश्न 3

यदि α = 0.95 है, तो β ज्ञात कीजिए।

β = 0.95/0.05

= 19

उत्तर: 19

★ संख्यात्मक प्रश्न 4

यदि β = 99 है, तो α ज्ञात कीजिए।

β = α/(1 − α)

से,

α = β/(1 + β)

= 99/100

= 0.99

उत्तर: 0.99

★ 20. ट्रांजिस्टर एक प्रवर्धक के रूप में (Transistor as an Amplifier)

★ परिभाषा

ट्रांजिस्टर की सहायता से छोटे विद्युत संकेत के वोल्टेज, धारा या शक्ति को बढ़ाने की प्रक्रिया को प्रवर्धन (Amplification) कहते हैं।

★ मुख्य बिंदु

★ छोटा इनपुट संकेत दिया जाता है।

★ ट्रांजिस्टर में धारा में बड़ा परिवर्तन उत्पन्न हो सकता है।

★ आउटपुट संकेत इनपुट से अधिक शक्ति का हो सकता है।

★ Common Emitter विन्यास प्रवर्धन के लिए बहुत उपयोगी है।

★ उदाहरण

i. रेडियो में कमजोर संकेत को बढ़ाना।

ii. माइक्रोफोन के संकेत को बढ़ाना।

iii. ऑडियो प्रवर्धक में  उपयोग।

★ 21. ट्रांजिस्टर एक स्विच के रूप में (Transistor as a Switch)

★ परिभाषा

ट्रांजिस्टर को ऐसे परिपथ में उपयोग करना जिसमें वह मुख्यतः बंद अवस्था और चालू अवस्था के बीच कार्य करे, ट्रांजिस्टर स्विच कहलाता है।

★ मुख्य अवस्थाएँ

★ कट-ऑफ अवस्था → स्विच OFF

★ संतृप्ति अवस्था → स्विच ON

★ मुख्य बिंदु

★ कट-ऑफ में धारा लगभग शून्य होती है।

★ संतृप्ति में ट्रांजिस्टर अधिक चालक अवस्था में होता है।

★ डिजिटल इलेक्ट्रॉनिक्स में इसका बहुत उपयोग है।

★ उदाहरण

i. डिजिटल परिपथ।

ii. LED को चालू-बंद करना।

iii. स्वचालित इलेक्ट्रॉनिक नियंत्रण परिपथ।

★ 22. तर्क द्वार (Logic Gates)

★ परिभाषा

तर्क द्वार ऐसे इलेक्ट्रॉनिक परिपथ हैं जो दिए गए एक या अधिक इनपुट संकेतों पर निश्चित तर्क नियम लागू करके एक आउटपुट प्रदान करते हैं। डिजिटल इलेक्ट्रॉनिक्स में इनका उपयोग निर्णय लेने और विभिन्न डिजिटल परिपथ बनाने के लिए किया जाता है।

—

★ AND द्वार (AND Gate)

★ परिभाषा

AND द्वार में आउटपुट 1 तभी प्राप्त होता है जब इसके सभी इनपुट 1 हों। यदि किसी एक इनपुट का मान 0 हो, तो आउटपुट 0 प्राप्त होता है।

★ तर्क संबंध

Y = A · B

★ सत्य सारणी

   A | B | Y
   0 | 0 | 0
   0 | 1 | 0
   1 | 0 | 0
   1 | 1 | 1

★ मुख्य बिंदु

★ सभी इनपुट 1 → आउटपुट 1

★ किसी एक इनपुट का 0 होना → आउटपुट 0

★ उदाहरण

i. दो आवश्यक शर्तें पूरी होने पर मशीन चालू होना।

ii. सुरक्षा परिपथ में दो संकेतों का एक साथ मिलना।

iii. दो स्विचों के एक साथ सक्रिय होने पर उपकरण चलना। 

★ OR द्वार (OR Gate)

★ परिभाषा

OR द्वार में यदि एक या एक से अधिक इनपुट का मान 1 हो, तो आउटपुट 1 प्राप्त होता है। आउटपुट केवल तभी 0 होता है जब सभी इनपुट 0 हों।

★ तर्क संबंध

Y = A + B

★ सत्य सारणी

A| B| Y
0| 0| 0
0| 1| 1
1| 0| 1
1| 1| 1

★ मुख्य बिंदु

★ कोई भी एक इनपुट 1 → आउटपुट 1

★ सभी इनपुट 0 → आउटपुट 0

★ उदाहरण

i. दो स्विचों में से किसी एक को दबाने पर घंटी बजना।

ii. दो अलग-अलग संकेतों में से किसी एक के मिलने पर परिपथ सक्रिय होना।

iii. चेतावनी परिपथ में किसी एक सेंसर के सक्रिय होने पर संकेत मिलना।

★ NOT द्वार (NOT Gate)

★ परिभाषा

NOT द्वार ऐसा तर्क द्वार है जो इनपुट के विपरीत आउटपुट देता है। अर्थात इनपुट 1 होने पर आउटपुट 0 तथा इनपुट 0 होने पर आउटपुट 1 होता है।

★ तर्क संबंध

Y = A̅

★ सत्य सारणी

  A | Y
  0 | 1
  1 | 0

★ मुख्य बिंदु

★ इनपुट और आउटपुट हमेशा एक-दूसरे के विपरीत होते हैं।

★ इसमें केवल एक इनपुट होता है।

★ उदाहरण

i. डिजिटल संकेत को उलटने में।

ii. नियंत्रण परिपथ में।

iii. डिजिटल उपकरणों में संकेत का प्रतिलोम प्राप्त करने में। 

★ 23. NAND द्वार (NAND Gate)

★ परिभाषा

AND द्वार के आउटपुट का प्रतिलोम करने पर प्राप्त तर्क द्वार को NAND द्वार कहते हैं।

★ तर्क संबंध

Y = (A · B)̅

★ सत्य सारणी

     A | B | Y
     0 | 0 |  1
     0 | 1 | 1
     1 | 0 | 1
     1 | 1 | 0

★ मुख्य बिंदु

★ दोनों इनपुट 1 होने पर आउटपुट 0 होता है।

★ बाकी सभी स्थितियों में आउटपुट 1 होता है।

★ NAND को सार्वत्रिक तर्क द्वार कहा जाता है।

★ उदाहरण

i. डिजिटल तर्क परिपथ।

ii. नियंत्रण प्रणाली।

iii. अन्य तर्क द्वारों के निर्माण में।

★ 24. NOR द्वार (NOR Gate)

★ परिभाषा

OR द्वार के आउटपुट का प्रतिलोम करने पर प्राप्त तर्क द्वार को NOR द्वार कहते हैं।

★ तर्क संबंध

Y = (A + B)̅

★ सत्य सारणी

     A | B | Y
      0 | 0 | 1
      0| 1 | 0
      1| 0 | 0
      1| 1 | 0

★ मुख्य बिंदु

★ दोनों इनपुट 0 होने पर आउटपुट 1 होता है।

★ किसी भी एक इनपुट के 1 होने पर आउटपुट 0 हो जाता है।

★ NOR भी एक सार्वत्रिक तर्क द्वार है।

★ उदाहरण

i. डिजिटल नियंत्रण परिपथ।

ii. तर्क आधारित निर्णय परिपथ।

iii. अन्य तर्क द्वारों के निर्माण में।

★ 25. तर्क द्वारों के महत्वपूर्ण नियम

★ AND

Y = A · B

सभी इनपुट 1 → आउटपुट 1

★ OR

Y = A + B

किसी एक इनपुट का 1 होना → आउटपुट 1

★ NOT

Y = A̅

आउटपुट = इनपुट का उल्टा

★ NAND

Y = (A · B)̅

AND का उल्टा

★ NOR

Y = (A + B)̅

OR का उल्टा

★ 26. AND, OR, NOT, NAND और NOR — एक नजर में

तर्क द्वार   | तर्क संबंध        | मुख्य नियम

AND        | Y = A · B        | सभी इनपुट 1 → आउटपुट 1

OR           | Y = A + B       | कोई एक इनपुट 1 → आउटपुट 1

NOT        | Y = A̅              | इनपुट का उल्टा आउटपुट

NAND     | Y = (A · B)̅      | AND का उल्टा

NOR        | Y = (A + B)̅     | OR का उल्टा

★ 27. अध्याय के सबसे महत्वपूर्ण सूत्र

★ शुद्ध अर्द्धचालक

nₑ = nₕ = nᵢ

★ ट्रांजिस्टर की धाराओं का संबंध

Iₑ = I𝚌 + Iᵦ

★ Common Base में धारा प्रवर्धन

α = ΔI𝚌 / ΔIₑ

★ Common Emitter में धारा प्रवर्धन

β = ΔI𝚌 / ΔIᵦ

★ α और β का संबंध

β = α / (1 − α)

α = β / (1 + β)

★ विद्युत शक्ति

P = VI

★ AND

Y = A · B

★ OR

Y = A + B

★ NOT

Y = A̅

★ NAND

Y = (A · B)̅

★ NOR

Y = (A + B)̅

★ 28. बोर्ड परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण प्रश्न

★ दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

1. शुद्ध और अशुद्ध अर्द्धचालक में अंतर स्पष्ट कीजिए।

2. n-प्रकार और p-प्रकार अर्द्धचालक को समझाइए।

3. p-n संधि के निर्माण को समझाइए।

4. रिक्तीकरण क्षेत्र तथा विभव प्राचीर क्या है?

5. अग्र अभिनति और उत्क्रम अभिनति को समझाइए।

6. अर्द्धचालक डायोड की V-I विशेषता समझाइए।

7. जेनर डायोड क्या है? इसका उपयोग वोल्टेज नियमन में कैसे किया जाता है?

8. ट्रांजिस्टर की संरचना और कार्यविधि समझाइए।

9. ट्रांजिस्टर की धाराओं में संबंध स्थापित कीजिए।

10. ट्रांजिस्टर को प्रवर्धक के रूप में समझाइए।

11. ट्रांजिस्टर को स्विच के रूप में समझाइए।

12. AND, OR तथा NOT तर्क द्वारों की सत्य सारणी लिखिए।

—

★ छोटे महत्वपूर्ण प्रश्न

1. अर्द्धचालक क्या है?

2. विवर किसे कहते हैं?

3. डोपिंग क्या है?

4. दाता और ग्राही अशुद्धि क्या है?

5. बहुसंख्यक और अल्पसंख्यक वाहक क्या हैं?

6. जेनर डायोड का मुख्य उपयोग क्या है?

7. ट्रांजिस्टर में आधार बहुत पतला क्यों रखा जाता है?

8. α और β में क्या संबंध है?

9. NAND और NOR को सार्वत्रिक द्वार क्यों कहा जाता है?

10. p-n संधि को अग्र अभिनति में कैसे जोड़ा जाता है?

★ 29. अध्याय से जुड़े स्वयं से पूछने वाले प्रश्न

★ अगर तापमान बढ़े तो शुद्ध अर्द्धचालक की चालकता क्यों बढ़ती है?

★ n-प्रकार अर्द्धचालक विद्युत रूप से उदासीन क्यों रहता है, जबकि उसमें अतिरिक्त इलेक्ट्रॉन होते हैं?

★ p-n संधि में रिक्तीकरण क्षेत्र अपने आप क्यों बनता है?

★ डायोड को एकदिशीय धारा का द्वार क्यों कहा जा सकता है?

★ जेनर डायोड सामान्य डायोड से किस प्रकार अलग है?

★ ट्रांजिस्टर में छोटी आधार धारा संग्राहक धारा में बड़ा परिवर्तन कैसे उत्पन्न कर सकती है?

★ डिजिटल परिपथों में 0 और 1 का क्या अर्थ है?

★ NAND और NOR से अन्य तर्क द्वार कैसे बनाए जा सकते हैं?

★ 30. स्व-परीक्षण (Self Test)

प्रश्न 1

p-प्रकार अर्द्धचालक में बहुसंख्यक वाहक कौन होते हैं?

(A) इलेक्ट्रॉन
(B) विवर ✓
(C) प्रोटॉन
(D) न्यूट्रॉन

प्रश्न 2

n-प्रकार अर्द्धचालक में बहुसंख्यक वाहक कौन होते हैं?

(A) विवर
(B) प्रोटॉन
(C) इलेक्ट्रॉन ✓
(D) न्यूट्रॉन

प्रश्न 3

p-n संधि के पास कौन-सा क्षेत्र बनता है?

(A) प्रकाश क्षेत्र
(B) रिक्तीकरण क्षेत्र ✓
(C) चुंबकीय क्षेत्र
(D) ताप क्षेत्र

प्रश्न 4

जेनर डायोड मुख्यतः किस कार्य के लिए उपयोगी है?

(A) वोल्टेज नियमन ✓
(B) ताप बढ़ाने
(C) द्रव्यमान मापने
(D) ध्वनि उत्पन्न करने

प्रश्न 5

ट्रांजिस्टर की धाराओं में सही संबंध कौन-सा है?

(A) Iₑ = I𝚌 + Iᵦ ✓
(B) I𝚌 = Iₑ + Iᵦ
(C) Iᵦ = Iₑ + I𝚌
(D) Iₑ = I𝚌 − Iᵦ

प्रश्न 6

Common Emitter में धारा प्रवर्धन किससे दर्शाते हैं?

(A) α
(B) β ✓
(C) γ
(D) λ

प्रश्न 7

AND द्वार का आउटपुट 1 कब होता है?

(A) सभी इनपुट 0 हों
(B) केवल एक इनपुट 1 हो
(C) सभी इनपुट 1 हों ✓
(D) किसी भी स्थिति में

प्रश्न 8

NOT द्वार का कार्य क्या है?

(A) जोड़ना
(B) गुणा करना
(C) इनपुट को उलटना ✓
(D) धारा रोकना

प्रश्न 9

NAND किसका उल्टा है?

(A) OR
(B) AND ✓
(C) NOT
(D) NOR

प्रश्न 10

NOR किसका उल्टा है?

(A) AND
(B) OR ✓
(C) NAND
(D) NOT

★ 31. इस अध्याय में होने वाली महत्वपूर्ण गलतियाँ

★ p-प्रकार में विवर बहुसंख्यक वाहक होते हैं।

★ n-प्रकार में इलेक्ट्रॉन बहुसंख्यक वाहक होते हैं।

★ डोपिंग में अशुद्धि की मात्रा बहुत कम होती है।

★ अग्र अभिनति में p को + और n को − से जोड़ते हैं।

★ उत्क्रम अभिनति में p को − और n को + से जोड़ते हैं।

★ α और β को एक ही धारा प्रवर्धन न समझें।

★ हमेशा याद रखें:

Iₑ = I𝚌 + Iᵦ

★ जेनर डायोड का मुख्य उपयोग वोल्टेज नियमन है।

★ AND और OR की सत्य सारणी आपस में न मिलाएँ।

★ NOT द्वार में केवल एक इनपुट होता है।

★ NAND = AND का उल्टा।

★ NOR = OR का उल्टा।

★ डायोड AC को सीधे स्थिर DC में नहीं बदलता। दिष्टकारी से स्पंदित DC प्राप्त होती है।

★ 32. अतिरिक्त महत्वपूर्ण बातें

★ सिलिकॉन (Si) आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक युक्तियों में बहुत व्यापक रूप से प्रयोग किया जाता है।

★ शुद्ध अर्द्धचालक में इलेक्ट्रॉन और विवर दोनों उपस्थित होते हैं।

★ डोपिंग द्वारा अर्द्धचालक की चालकता को नियंत्रित किया जाता है।

★ p-n संधि डायोड, LED और सौर सेल जैसी कई युक्तियों का आधार है।

★ जेनर डायोड को सामान्यतः उत्क्रम अभिनति में भंजन क्षेत्र के आसपास चलाया जाता है।

★ ट्रांजिस्टर के तीन भाग हैं—

उत्सर्जक (Emitter)
आधार (Base)
संग्राहक (Collector)

★ ट्रांजिस्टर के दो प्रमुख उपयोग हैं—

प्रवर्धन (Amplification)
स्विचिंग (Switching)

★ डिजिटल इलेक्ट्रॉनिक्स में तर्क द्वारों का महत्वपूर्ण स्थान है।

★ NAND और NOR दोनों सार्वत्रिक तर्क द्वार (Universal Gates) हैं।

★ 33. अंतिम त्वरित पुनरावृत्ति

अर्द्धचालक → चालक और कुचालक के बीच चालकता वाला पदार्थ।

शुद्ध अर्द्धचालक → इलेक्ट्रॉन और विवर की संख्या बराबर।

n-प्रकार → इलेक्ट्रॉन बहुसंख्यक।

p-प्रकार → विवर बहुसंख्यक।

p-n संधि → p और n क्षेत्रों की सीमा।

रिक्तीकरण क्षेत्र → गतिशील आवेश वाहकों से लगभग रिक्त क्षेत्र।

अग्र अभिनति → p को +, n को −।

उत्क्रम अभिनति → p को −, n को +।

डायोड → धारा को मुख्यतः एक दिशा में प्रवाहित करता है।

जेनर डायोड → वोल्टेज नियमन के लिए उपयोगी।

ट्रांजिस्टर → प्रवर्धक और स्विच के रूप में उपयोगी।

Iₑ = I𝚌 + Iᵦ

β = ΔI𝚌 / ΔIᵦ

α = ΔI𝚌 / ΔIₑ

β = α / (1 − α)

AND → सभी इनपुट 1 तो आउटपुट 1।

OR → कोई एक इनपुट 1 तो आउटपुट 1।

NOT → इनपुट का उल्टा।

NAND → AND का उल्टा।

NOR → OR का उल्टा।

★ 34. बोर्ड परीक्षा के लिए अंतिम चेकलिस्ट

परीक्षा से पहले यह जरूर देख लें—

□ अर्द्धचालक की परिभाषा

□ शुद्ध और अशुद्ध अर्द्धचालक

□ n-प्रकार और p-प्रकार

□ दाता और ग्राही अशुद्धि

□ विवर और इलेक्ट्रॉन

□ p-n संधि

□ रिक्तीकरण क्षेत्र

□ विभव प्राचीर

□ अग्र और उत्क्रम अभिनति

□ डायोड की V-I विशेषता

□ जेनर डायोड

□ दिष्टकारी

□ ट्रांजिस्टर के तीन भाग

□ Iₑ = I𝚌 + Iᵦ

□ α और β का संबंध

□ ट्रांजिस्टर का प्रवर्धक के रूप में उपयोग

□ ट्रांजिस्टर का स्विच के रूप में उपयोग

□ AND, OR, NOT

□ NAND और NOR

□ सभी सत्य सारणियाँ

□ सभी महत्वपूर्ण सूत्र

□ संख्यात्मक प्रश्नों में इकाई

★ अध्याय का अंतिम सार

अर्द्धचालक इलेक्ट्रॉनिकी में हम यह समझते हैं कि कुछ पदार्थों की चालकता को नियंत्रित करके उनका उपयोग इलेक्ट्रॉनिक युक्तियाँ बनाने में कैसे किया जाता है।

शुद्ध अर्द्धचालक → डोपिंग → p-प्रकार / n-प्रकार → p-n संधि → डायोड → जेनर डायोड → ट्रांजिस्टर → तर्क द्वार

यही इस पूरे अध्याय की मुख्य कड़ी है।

★ सबसे पहले अर्द्धचालक के गुण समझें।

★ फिर डोपिंग और p-n संधि समझें।

★ उसके बाद डायोड और जेनर डायोड पढ़ें।

★ फिर ट्रांजिस्टर की धाराएँ तथा α, β अच्छी तरह समझें।

★ अंत में तर्क द्वार और उनकी सत्य सारणियाँ तैयार करें।

इस क्रम से पढ़ने पर पूरा अध्याय एक-दूसरे से जुड़ा हुआ और आसानी से समझ आने वाला लगेगा।

Scroll to Top